यूजीसी कानून: सवर्णों की जी-जान का जंजाल भी, शिक्षा का सर्वनाश भी
यूजीसी द्वारा लाया गया नया कानून शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों पर थोपा गया एक ऐसा ढांचा है, जो हर वर्ग के लिए चिंता का कारण बन चुका है। यह कानून जहां हाशिए के समाज में असुरक्षा बढ़ाता है, वहीं अब यह सवर्ण समाज की जी-जान का जंजाल भी बनता जा रहा है। शिक्षक हों या छात्र—सब असमंजस और भय के माहौल में जीने को मजबूर हैं।
कानून के नाम पर विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को खत्म करना, प्रशासनिक शक्ति को निरंकुश बनाना और शिकायत मात्र पर कठोर कार्रवाई की व्यवस्था लोकतांत्रिक सोच पर सीधा हमला है। यह व्यवस्था न न्यायसंगत है, न ही व्यावहारिक। इससे न पढ़ाई सुधरेगी, न शोध—बल्कि डर, संदेह और टकराव ही बढ़ेगा।
सवर्ण समाज के छात्र-शिक्षक, जो अब तक खुद को अपेक्षाकृत सुरक्षित मानते थे, वे भी इस कानून से आशंकित हैं। कारण साफ है—आज यह कानून किसी एक वर्ग पर लागू नहीं, बल्कि पूरे शैक्षणिक तंत्र को जकड़ने वाला फंदा बन चुका है। जब नियम अस्पष्ट हों और शक्ति एकतरफा हो, तो कल कोई भी उसका शिकार बन सकता है।
शिक्षा संस्थान अनुशासन से चलते हैं, दमन से नहीं। विश्वविद्यालय प्रश्न पूछने की जगह होते हैं, जवाब दबाने की नहीं। यदि असहमति को अनुशासनहीनता और आलोचना को अपराध माना जाएगा, तो देश का बौद्धिक भविष्य अंधकार में चला जाएगा।
सरकार को यह समझना होगा कि शिक्षा कानून ताकत दिखाने का माध्यम नहीं है। यह देश का भविष्य गढ़ने की जिम्मेदारी है। इसलिए यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि इस यूजीसी कानून को तुरंत वापस लिया जाए, व्यापक संवाद हो और ऐसा ढांचा बने जो भय नहीं, भरोसे पर टिका हो।
शिक्षा को जंजाल नहीं बनने दिया जा सकता।
यूजीसी कानून वापस लिया जाए।
— संपादकीय
विशाल समाचार
देवेन्द्र सिंह तोमर

