संपादकीय

इटावा: जवाबदेही से भागता प्रशासन या सच से डरता सिस्टम?

इटावा: जवाबदेही से भागता प्रशासन या सच से डरता सिस्टम?

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इटावा में प्रशासनिक व्यवस्था पर एक साथ दो गंभीर सवाल खड़े हुए हैं—और दोनों ही सीधे तौर पर जवाबदेही और पारदर्शिता की जड़ पर चोट करते हैं। एक ओर Uttar Pradesh Human Rights Commission द्वारा जिलाधिकारी के खिलाफ 50 हजार रुपये का जमानती वारंट जारी होना, और दूसरी ओर सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी का समय पर न मिलना—ये दोनों घटनाएं महज संयोग नहीं, बल्कि एक गहरे प्रशासनिक संकट के संकेत हैं।

राजीव कुमार यादव आत्महत्या प्रकरण में आयोग का सख्त रुख बताता है कि मामला सामान्य नहीं है। जब एक संवैधानिक संस्था को अपने आदेशों के पालन के लिए वारंट जारी करना पड़े, तो यह केवल एक अधिकारी की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता को उजागर करता है। क्या प्रशासन इतना निरंकुश हो गया है कि उसे आयोग के निर्देश भी हल्के लगने लगे हैं?

दूसरी तरफ, Uttar Pradesh State Information Commission की दहलीज तक पहुंचता आरटीआई मामला और भी गंभीर है। लोकतंत्र में सूचना का अधिकार नागरिक का सबसे बड़ा हथियार है। अगर वही कुंद किया जाने लगे, तो फिर पारदर्शिता की बात बेमानी हो जाती है। सवाल यह है कि आखिर जानकारी देने में हिचक क्यों? क्या छिपाने के लिए कुछ है, या फिर जवाबदेही से बचने की आदत बन चुकी है?

‘विशाल समाचार’ द्वारा उठाए गए मुद्दे पर भी प्रशासन की चुप्पी कई शंकाओं को जन्म देती है। शिकायतें, मीडिया रिपोर्ट और आरटीआई—तीनों के बावजूद कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं होना, यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं सिस्टम सच को दबाने की कोशिश कर रहा है। और यदि ऐसा है, तो यह केवल एक जिले की समस्या नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे के लिए खतरे की घंटी है।

यह भी विडंबना है कि एक ओर सरकार पारदर्शिता और सुशासन की बात करती है, वहीं जमीनी स्तर पर अधिकारी सूचना देने से कतराते नजर आते हैं। क्या यह दोहरी नीति नहीं है? क्या जवाबदेही केवल कागजों तक सीमित रह गई है?

अब समय आ गया है कि इटावा प्रशासन साफ करे—क्या वह जनता के प्रति जवाबदेह है या केवल सत्ता के प्रति? क्योंकि अगर सच दबाया जाएगा, तो सवाल और तेज होंगे। और अगर जवाब नहीं मिलेगा, तो भरोसा भी टूटेगा।

अंततः, यह मामला सिर्फ एक वारंट या एक आरटीआई का नहीं है—यह उस भरोसे का है, जिस पर लोकतंत्र टिका होता है। अगर वही डगमगाने लगे, तो फिर सबसे बड़ा नुकसान जनता का ही होता है।

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