
अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त निजी अनुदानित स्कूलों में भी आरटीई के तहत प्रवेश मिले: सांसद डॉ. मेधा कुलकर्णी
रिपोर्ट :विशाल समाचार
स्थान: पुणे महाराष्ट्र
पुणे: देश के सभी निजी अनुदानित और अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त स्कूलों में भी राइट टू एजुकेशन (आरटीई) कानून के तहत विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाना चाहिए। इसके लिए आरटीई नीति में आवश्यक संशोधन कर अधिक से अधिक गरीब और वंचित बच्चों को शिक्षा का अवसर उपलब्ध कराया जाए। यह मांग राज्यसभा सांसद Megha Kulkarni ने की।
संसद के शून्यकाल में बोलते हुए डॉ. कुलकर्णी ने आरटीई से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए। उन्होंने कहा कि देश में कोई भी बच्चा निरक्षर या स्कूल से बाहर न रहे, इसके लिए 17 वर्ष पहले Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009 लागू किया गया था। इसके बावजूद देश में निरक्षरता और स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। देश में 6 से 17 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 16.8 प्रतिशत बच्चे अभी भी स्कूल से बाहर हैं, जबकि कुल जनसंख्या का करीब 19 प्रतिशत हिस्सा अब भी निरक्षर है।
महाराष्ट्र की स्थिति का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि इस वर्ष आरटीई के तहत लगभग 3 लाख 5 हजार विद्यार्थियों ने आवेदन किया, जिनमें से करीब 1 लाख 1 हजार विद्यार्थियों को विभिन्न स्कूलों में प्रवेश मिला है। राज्य में आरटीई के अंतर्गत कुल 1 लाख 9 हजार सीटें उपलब्ध हैं। सीटों की तुलना में मांग लगभग तीन गुना अधिक होने के कारण कई गरीब और वंचित विद्यार्थी शिक्षा के अधिकार से वंचित रह जाते हैं।
डॉ. कुलकर्णी ने कहा कि कई स्कूलों को अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान का दर्जा मिलने के कारण उन्हें आरटीई की 25 प्रतिशत आरक्षित सीटों से छूट मिल जाती है। जबकि अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्राप्त करने के लिए कम से कम 50 प्रतिशत विद्यार्थी उसी अल्पसंख्यक समुदाय से होना अपेक्षित है। व्यवहार में इन स्कूलों में बड़ी संख्या में अन्य समुदायों के विद्यार्थी भी पढ़ते हैं, फिर भी ये संस्थान आरटीई के प्रावधानों से बाहर रहते हैं। इसलिए सरकार को ऐसी स्कूलों में भी आरटीई के तहत प्रवेश की व्यवस्था पर नीति बनाने की जरूरत है।
उन्होंने यह भी कहा कि निजी गैर-अनुदानित स्कूलों में आरटीई के तहत 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित रखना अनिवार्य है, लेकिन इन विद्यार्थियों के लिए सरकार द्वारा दी जाने वाली प्रतिपूर्ति राशि अक्सर समय पर नहीं मिलती। इससे स्कूलों और अन्य मध्यमवर्गीय अभिभावकों पर आर्थिक दबाव बढ़ता है। इसलिए सरकार को प्रतिपूर्ति राशि समय पर उपलब्ध करानी चाहिए।
डॉ. कुलकर्णी ने आगे कहा कि सरकारी और अनुदानित निजी स्कूलों को सरकार से बड़ी मात्रा में आर्थिक सहायता मिलती है। शिक्षकों के वेतन, बुनियादी ढांचे और अन्य सुविधाओं के लिए अनुदान दिया जाता है। ऐसे में यदि इन स्कूलों में भी आरटीई के तहत प्रवेश की व्यवस्था की जाए तो अधिक बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सकती है। साथ ही कई स्कूलों में खाली रहने वाली सीटों का भी बेहतर उपयोग हो सकेगा।
उन्होंने यह भी बताया कि महाराष्ट्र में आरटीई के तहत चयनित करीब 20 हजार विद्यार्थियों ने निजी गैर-अनुदानित स्कूलों में प्रवेश नहीं लिया है। हालांकि उनकी फीस माफ होती है, लेकिन यूनिफॉर्म, किताबें, परिवहन, सहली और अन्य गतिविधियों का खर्च गरीब परिवारों के लिए वहन करना कठिन होता है। ऐसे में यदि अनुदानित स्कूलों में भी आरटीई लागू किया जाए तो इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
इसके साथ ही आरटीई प्रवेश प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए तकनीक आधारित केंद्रीकृत प्रवेश प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता पर भी उन्होंने जोर दिया, ताकि देश में 100 प्रतिशत साक्षरता का लक्ष्य हासिल किया जा सके और स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों की संख्या शून्य तक लाई जा सके।


