
भगत सिंह, सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु के आदर्शों को अपनाकर युवाओं को राष्ट्रसेवा में योगदान देना चाहिए: मंजुश्री खर्डेकर
पतित पावन संगठन की ओर से शहीदों को श्रद्धांजलि
पुणे: “भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु सहित अन्य क्रांतिकारियों ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। उनके विचारों से प्रेरणा लेकर राष्ट्रसेवा का यह संकल्प युवाओं को निभाना चाहिए। एक जागरूक, सशक्त और संगठित समाज के निर्माण के लिए युवाओं को देश के विकास में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए,” यह विचार वरिष्ठ नगरसेविका मंजुश्री खर्डेकर ने व्यक्त किए।
पतित पावन संगठन की ओर से शहीद दिवस के अवसर पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कर्वे रोड स्थित सावरकर स्मारक में आयोजित इस कार्यक्रम में संगठन के प्रांत महासचिव नितीन सोनटक्के, प्रांत उपाध्यक्ष राजाभाऊ पाटील, पुणे शहराध्यक्ष श्रीकांत शिळीमकर, शहर पालक मनोज नायर, कार्याध्यक्ष गोकुल शेलार, महासचिव जालिंदर टेमघरे, जिला अध्यक्ष सुनील मराठे, अहिल्यानगर जिला अध्यक्ष गोरक्षनाथ सोनवणे, कोल्हापुर जिला कार्याध्यक्ष काका मोहिते, शहर संपर्क प्रमुख तेजस पाबळे, उपाध्यक्ष निलेश जोशी व प्रशांत कुरुमकर, संगठनकर्ता विजय गावडे, शरद देशमुख, सौरभ कुलकर्णी, कामगार शिक्षा प्रमुख राजाभाऊ बर्गे, सह-संगठनकर्ता प्रविण ठाकुर, सह-संपर्क प्रमुख राहुल पडवळ, कोथरूड विभाग अध्यक्ष अण्णा बांगर, उपाध्यक्ष विनोद बागल, शिवाजीनगर विभाग अध्यक्ष अक्षय बर्गे सहित अनेक पदाधिकारी उपस्थित थे।
नितीन सोनटक्के ने कहा, “शहीदों के बलिदान का महत्व युवाओं को समझना चाहिए और देशसेवा के लिए आगे आना चाहिए। क्रांतिकारियों की विरासत को आगे बढ़ाते हुए समाज में संगठन और एकता को मजबूत करना जरूरी है। छत्रपति शिवाजी महाराज, भगत सिंह, राजगुरु और विनायक दामोदर सावरकर के त्याग और बलिदान से प्रेरणा लेकर युवाओं को जागरूक और संगठित कार्य करना चाहिए। समाज में तनाव को दूर करने के लिए एकता और सक्रिय सहभागिता आवश्यक है।”
वक्ताओं ने कहा कि मात्र 22 वर्ष की आयु में देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का स्मरण करना हम सभी का कर्तव्य है। उनके साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति ने इतिहास रचा। उनके विचारों की विरासत को आगे बढ़ाना हमारी जिम्मेदारी है। नई पीढ़ी तक क्रांतिकारियों के विचार पहुंचाना ही इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य है, ऐसा श्रीकांत शिळीमकर ने बताया।



