
मानवी मूल्यों की कसौटी का दौर: डॉ. श्रीपाल सबनीस
पुणे में एकदिवसीय विश्वशांति परिषद का आयोजन
रिपोर्ट :विशाल समाचार
स्थान:पुणे महाराष्ट्र
पुणे। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियां मानवता के मूल्यों की कठोर परीक्षा ले रही हैं। युद्ध जैसी स्थितियां अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि वे पूरी मानवता को प्रभावित कर रही हैं। यह केवल राजनीतिक या सामाजिक संघर्ष नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों की कसौटी का समय है। ये विचार वरिष्ठ साहित्यकार एवं पूर्व सम्मेलन अध्यक्ष डॉ. श्रीपाल सबनीस ने व्यक्त किए।
भगवान महावीर एजुकेशन सोसायटी एवं अन्य संस्थाओं के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित विश्वशांति परिषद में डॉ. सबनीस मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। यह कार्यक्रम पुणे के टिलक रोड स्थित महाराष्ट्र साहित्य परिषद के पटवर्धन सभागार में आयोजित किया गया, जिसका उद्घाटन सरहद संस्था के अध्यक्ष संजय नहार ने किया।
इस अवसर पर भगवान महावीर एजुकेशन सोसायटी के अध्यक्ष प्रा. डॉ. अशोककुमार पगारिया, जेन मास्टर भंते सुदर्शन, फादर एंटोन डिसूजा, महाराष्ट्र साहित्य परिषद की कार्यवाह अंजली कुलकर्णी, मूलनिवासी मुस्लिम मंच के अध्यक्ष अंजुम इनामदार, विचारक सरदार पदमसिंह, प्राचार्य सदाशिव कांबळे सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
डॉ. सबनीस ने कहा कि युद्ध का सबसे अधिक दुष्प्रभाव निर्दोष नागरिकों पर पड़ता है। महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्गों का दुख किसी भी जीत से बड़ा होता है। धर्म कभी हिंसा का समर्थन नहीं करता, बल्कि युद्ध मानव के लोभ और सत्ता की महत्वाकांक्षा का परिणाम है। उन्होंने कहा कि वैश्विक राजनीति में बढ़ते ध्रुवीकरण के कारण संघर्ष और तीव्र हो रहे हैं। विज्ञान की प्रगति तब तक सार्थक नहीं है, जब तक मानव सुरक्षित नहीं है। संवाद, सहिष्णुता और परस्पर सम्मान के माध्यम से ही विश्वशांति स्थापित की जा सकती है।
संजय नहार ने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने 1893 में विश्व धर्म सम्मेलन में ‘सर्वधर्म समभाव’ और ‘विश्वबंधुत्व’ का संदेश दिया था, जिसकी प्रासंगिकता आज और बढ़ गई है। भारत को ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना के साथ वैश्विक शांति के लिए आगे आना चाहिए।
प्रा. डॉ. अशोककुमार पगारिया ने कहा कि युद्ध का प्रभाव केवल युद्धरत देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। ईंधन संकट और संसाधनों की कमी जैसे प्रभाव आम जनता के जीवन को प्रभावित करते हैं।
फादर एंटोन डिसूजा ने कहा कि ईश्वर शांति, आशा और प्रकाश का स्रोत है। आज विज्ञान प्रगति कर रहा है, लेकिन वह प्रेम और मानवीय संवेदनाएं नहीं उत्पन्न कर सकता। भंते सुदर्शन ने कहा कि दुनिया युद्ध के मुहाने पर खड़ी है, ऐसे में सभी धर्मों के लोगों को मिलकर शांति के लिए प्रयास करना चाहिए।
अंजली कुलकर्णी ने इस पहल को अत्यंत सराहनीय बताया और कहा कि विभिन्न धर्मों के लोगों को एक मंच पर लाकर शांति और एकता का संदेश देना समय की मांग है। अंजुम इनामदार ने कहा कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है और उसी के आधार पर विश्वशांति संभव है।
कार्यक्रम का संचालन प्रा. विभा ब्राह्मणकर ने किया, जबकि प्राचार्य सदाशिव कांबळे ने स्वागत किया। कार्यक्रम की शुरुआत लता ललवानी द्वारा साने गुरुजी के गीत ‘माणसाने माणसाशी माणसासम वागणे’ से हुई।



