
द्विध्रुवीय मन को समझने की जरूरत: मीना राजपूत
रिपोर्ट: विशाल समाचार
स्थान: पुणे महाराष्ट्र
पुणे: बायपोलर मूड डिसऑर्डर केवल सामान्य मूड स्विंग नहीं, बल्कि मस्तिष्क से जुड़ा एक गंभीर चिकित्सीय रोग है। उचित उपचार और परिवार के सहयोग से इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है और व्यक्ति एक संतुलित व सफल जीवन जी सकता है। इसलिए द्विध्रुवीय मन को समझना बेहद जरूरी है, ऐसा मत समतोल बायपोलर मूड डिसऑर्डर सहायता समूह की समन्वयक मीना वीरेन राजपूत ने व्यक्त किया।
विश्व बायपोलर दिवस के अवसर पर उन्होंने अपने पति विरेन के अनुभवों के माध्यम से इस बीमारी की वास्तविकता साझा की। विरेन एक सफल और प्रतिभाशाली पेशेवर हैं, लेकिन उनके जीवन में मनोदशा के अत्यधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिले। ‘मेनिया’ की अवस्था में उनमें अत्यधिक ऊर्जा आ जाती थी, वे कई घंटों तक बिना सोए काम करते, तेजी से बोलते और जोखिम भरे निर्णय लेते थे। वहीं कुछ समय बाद ‘डिप्रेशन’ के दौर में वे पूरी तरह टूट जाते, बिस्तर से उठने की इच्छा भी नहीं होती और नकारात्मक विचारों से घिर जाते थे।
मीना राजपूत ने बताया कि जब यह समझ आया कि यह समस्या बायपोलर मूड डिसऑर्डर के कारण है, तब उन्होंने मनोचिकित्सकों की मदद ली। दवाओं, काउंसलिंग और स्व-सहायता समूह के सहयोग से पिछले दस वर्षों से उनकी स्थिति स्थिर है। विरेन पिछले 18 वर्षों से ‘कनेक्टिंग ट्रस्ट’ में स्वयंसेवक के रूप में कार्यरत हैं, जिससे उन्हें मानसिक संतोष मिलता है। इसी अनुभव के आधार पर ‘समतोल बायपोलर मूड डिसऑर्डर सहायता समूह, पुणे’ की स्थापना की गई।
यह समूह वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. उल्हास लुकतुके और डॉ. विद्याधर वाटवे के मार्गदर्शन में कार्य कर रहा है, जबकि डॉ. सुजलाताई वाटवे भी समूह को दिशा-निर्देश देती हैं।
बायपोलर डिसऑर्डर में ‘मेनिया’ और ‘डिप्रेशन’ जैसी दो विपरीत अवस्थाएं देखने को मिलती हैं। इसके प्रमुख कारणों में मस्तिष्क के रसायनों का असंतुलन, अनुवांशिकता और तनाव शामिल हैं। इस बीमारी को ‘पागलपन’ के रूप में देखने के बजाय सहानुभूति और उपचार की आवश्यकता के रूप में समझना जरूरी है, ऐसा भी राजपूत ने कहा।


