
निजी बीमा कंपनियों द्वारा दावों की अस्वीकृति बढ़ी, सख्त नियमन की मांग
राज्यसभा में सांसद प्रा. डॉ. मेधा विश्राम कुलकर्णी ने उठाया मुद्दा, पॉलिसीधारकों को हो रही परेशानी पर जताई चिंता
रिपोर्ट :विशाल समाचार
स्थान:पुणे महाराष्ट्र
पुणे,निजी स्वास्थ्य बीमा कंपनियों द्वारा दावों के निपटान में देरी और उन्हें अनुचित रूप से अस्वीकार करने की बढ़ती प्रवृत्ति को लेकर राज्यसभा सांसद प्रा. डॉ. मेधा विश्राम कुलकर्णी ने संसद में गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि इस कारण आम पॉलिसीधारकों को आर्थिक और मानसिक रूप से भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
उन्होंने बताया कि बीमा कंपनियां कैशलेस उपचार और त्वरित दावा निपटान का दावा करती हैं, लेकिन व्यवहार में आपातकालीन परिस्थितियों में कई मामलों में दावे आंशिक रूप से मंजूर होते हैं या तकनीकी कारणों से खारिज कर दिए जाते हैं। पूर्व-विद्यमान बीमारियों, दस्तावेजों की कमी और पॉलिसी की शर्तों का हवाला देकर दावे अस्वीकार किए जाते हैं।
इन्शुरन्स रेग्युलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, बीमा क्षेत्र में करीब 2.57 लाख शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें से लगभग 1.22 लाख शिकायतें दावा निपटान से संबंधित हैं। इनमें स्वास्थ्य बीमा का बड़ा हिस्सा है।
कुलकर्णी ने कहा कि दावों के निपटान में देरी, बार-बार दस्तावेज मांगना और लंबी जांच प्रक्रिया के कारण मरीजों और अस्पतालों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कई बार कैशलेस सुविधा न मिलने से मरीजों के परिजनों को डिस्चार्ज के समय भारी रकम चुकानी पड़ती है।
उन्होंने केंद्र सरकार से बीमा क्षेत्र में कड़ा नियमन लागू करने, अनुचित दावे अस्वीकार करने वाली कंपनियों पर सख्त कार्रवाई करने और शिकायतों के 30 दिनों के भीतर निपटान की व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की। साथ ही, अस्पतालों के साथ बेहतर समन्वय के लिए स्वतंत्र क्लेम मैनेजर नियुक्त करने और पॉलिसी की शर्तों में पारदर्शिता बढ़ाने पर भी जोर दिया।
सांसद ने कहा कि पॉलिसीधारकों के हितों की रक्षा और स्वास्थ्य बीमा प्रणाली में विश्वास बनाए रखने के लिए त्वरित एवं ठोस कदम उठाना आवश्यक है।



