28 वर्षीय आयटी व्यावसायिक के पॅन्क्रियास से 12 सेमी की गांठ से द्रव निचरा करने में सफलता
· विश्वराज हॉस्पिटल, लोणी के डॉक्टरों द्वारा एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड गाइडेड सिस्टो गैस्ट्रोस्टोमी प्रक्रिया
रिपोर्ट विशाल समाचार
स्थान पुणे महाराष्ट्र
पुणे, : विश्वराज हॉस्पिटल, लोणी के डॉक्टरों की टीम ने 28 वर्षीय आयटी व्यावसायिक पुरुष मरीज पर एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड गाइडेड सिस्टो गैस्ट्रोस्टोमी प्रक्रिया सफलतापूर्वक करते हुए पॅन्क्रियास में निर्माण हुई द्रवयुक्त गांठ (पैंक्रियाटिक स्यूडोसिस्ट) को निकालने में सफलता प्राप्त की. यह प्रक्रिया सामान्यतः की जाती है, लेकिन इस प्रकार की स्थिति में 12 सेमी आकार की गांठ बहुत कम देखने को मिलती है. इस प्रक्रिया के दौरान लगभग 1500 मिली द्रव का निचरा किया गया.
इस बारे में जानकारी देते हुए विश्वराज हॉस्पिटल, लोणी के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. प्रविश घुरडे ने बताया कि जब यह युवक उनके पास आया, तब उसे पेट में तीव्र दर्द, बुखार, भूख न लगना, उल्टी जैसा महसूस होना और वजन कम होना जैसी लक्षणे थीं. अस्पताल आने से पहले उसने बाहर सलाह लेकर सीटी स्कैन और सोनोग्राफी जैसी जांचें करवाई थीं. इन जांचों में उसके पॅन्क्रियास में 12 सेमी की बड़ी द्रवयुक्त गांठ होने का पता चला.
इस प्रकार की गांठ सामान्यतः पैंक्रियाटाइटिस इस स्थिति के बाद उत्पन्न होने वाली जटिलताओं के कारण बनती है, जिसे पॅनक्रिएटिक स्युडोसिस्ट कहा जाता है. यह एक सामान्य जटिलता है, जिसमें पैंक्रियाटाइटिस के 4 से 6 सप्ताह बाद इस प्रकार की गांठ बनती है. आमतौर पर यह गांठ कैंसरग्रस्त नहीं होती और इसका आकार 4 से 5 सेमी होने के कारण यह अपने आप ड्रेन हो जाती है. लेकिन इस युवक के मामले में गांठ का आकार 12 सेमी था.
डॉ. घुरडे ने आगे बताया कि, इसी कारण डॉक्टरों की टीम ने एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड गाइडेड सिस्टो गैस्ट्रोस्टोमी प्रक्रिया करने का निर्णय लिया। यह एक कम से कम छेदवाली प्रभावी प्रक्रिया है, जिसका उपयोग पेट द्वारा पैंक्रियाटिक स्यूडोसिस्ट का निचरा करने के लिए किया जाता है. इस तकनीक में अल्ट्रासाउंड गाइडेड एंडोस्कोप का उपयोग किया जाता है, जिससे गांठ और पेट के बीच संपर्क स्थापित किया जाता है. इससे अंतर्गत रूप से निचरा हो जाता है और सर्जरी की आवश्यकता नहीं पड़ती. इस प्रक्रिया में कलर डॉपलर इमेजिंग का उपयोग किया जाता है, जिससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि संपर्क स्थापित करते समय कोई रक्तवाहिनी बीच में न आए, जिससे प्रक्रिया अधिक सुरक्षित बनती है. इसके बाद इस मार्ग में मेटल स्टेंट डाला जाता है, जिससे द्रव का लगातार निचरा होता रहता है.
इस प्रक्रिया में लगभग दो घंटे का समय लगा. मरीज को अगले ही दिन घर छोड़ दिया गया. प्रक्रिया की सफलता का अंदाजा मरीज के लक्षणों में आई कमी से लगाया गया. साथ ही लगभग 15 दिनों बाद सोनोग्राफी के जरिए यह जांच की जाएगी कि गांठ पूरी तरह खाली हुई है या नहीं. डॉक्टरों की टीम में डॉ. प्रविश घुरडे के साथ एनेस्थेटिस्ट डॉ. क्षितिज गायकवाड भी शामिल थे.



