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सीता के बिना रामराज्य की कल्पना अधूरी — भैय्याजी जोशी

एमआईटी डब्ल्यूपीयू में ‘सीता की अनकही कहानी’ पुस्तक का विमोचन

सीता के बिना रामराज्य की कल्पना अधूरी — भैय्याजी जोशी

एमआईटी डब्ल्यूपीयू में ‘सीता की अनकही कहानी’ पुस्तक का विमोचन

रिपोर्ट:विशाल समाचार 

स्थान: पुणे, महाराष्ट्र 

“शस्त्र कभी भी शांति स्थापित नहीं कर सकते, उनसे केवल विनाश होता है। स्थायी शांति के लिए विनाशकारी प्रवृत्तियों का अंत आवश्यक है। रामायण हमें मर्यादा और लक्ष्मण रेखा का महत्व समझाती है। मर्यादा के बिना विनाश निश्चित है। रामराज्य एक आदर्श व्यवस्था है, लेकिन सीता के बिना उसकी कल्पना पूर्ण नहीं हो सकती।” यह विचार विश्व हिंदू परिषद के मार्गदर्शक भैय्याजी जोशी ने व्यक्त किए।

मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशर्स, भारतीय विचार साधना पुणे प्रकाशन और एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी के संयुक्त तत्वावधान में अमेरिकी यहूदी लेखिका डेना मरियम की मूल अंग्रेजी पुस्तक ‘द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ सीता’ के मराठी अनुवाद ‘सीतेची न सांगितलेली कथा’ का विमोचन एमआईटी डब्ल्यूपीयू में किया गया। इस अवसर पर भैय्याजी जोशी मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे।

कार्यक्रम में भारतीय विचार साधना पुणे प्रकाशन के कार्यवाह काशीनाथ देवधर, एमआईटी डब्ल्यूपीयू के कुलगुरु डॉ. आर.एम. चिटणीस तथा प्रसिद्ध वक्ता डॉ. संजय उपाध्ये भी उपस्थित थे।

इस आयोजन को एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. विश्वनाथ दा. कराड का आशीर्वाद प्राप्त था तथा एमआईटी डब्ल्यूपीयू के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. राहुल वि. कराड के मार्गदर्शन में कार्यक्रम संपन्न हुआ।

भैय्याजी जोशी ने कहा कि सीता का जन्म केवल शारीरिक संरचना से परे, भूमिपुत्री के रूप में हुआ है। राम और सीता को दैवीय आत्मा के रूप में देखना चाहिए। दोनों ने सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ धर्मकार्य किया। उन्होंने कहा कि युवाओं द्वारा धर्मरक्षा हो, इसके लिए विश्वामित्र ने समाज को दिशा देने का कार्य किया। रामायण के प्रसंग आज भी प्रासंगिक हैं और यह बताते हैं कि राजा राज्य का स्वामी नहीं, बल्कि दायित्व निभाने वाला होता है।

उन्होंने आगे कहा कि सीता ने सिखाया कि व्यक्ति सुखी रहे, लेकिन सुखासीन न बने। प्रजा की सुरक्षा के लिए राजा को विचारपूर्वक कार्य करना चाहिए। स्वतंत्रता और स्वैराचार में अंतर समझना आवश्यक है। गुरुकुल शिक्षा विद्यार्थियों को सोचने और समझने की क्षमता देती है तथा विचारों के आधार पर ही देश को आगे बढ़ाया जा सकता है।

काशीनाथ देवधर ने कहा कि हिंदुत्व के बारे में फैली कई भ्रांतियों का उल्लेख इस पुस्तक में किया गया है। साध्वी डेना मरियम द्वारा लिखित इस पुस्तक में सहअस्तित्व और समन्वय का संदेश दिया गया है।

डॉ. संजय उपाध्ये ने कहा कि भगवान राम के आदर्श आज भी समाज को सही दिशा दिखाते हैं। सत्य, नैतिकता और सम्मान के मार्ग पर चलकर आदर्श समाज का निर्माण किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक भारतीय नारी के धैर्य, सामर्थ्य, प्रेम और निःस्वार्थ त्याग की कहानी प्रस्तुत करती है।

डॉ. आर.एम. चिटणीस ने कहा कि एलटीसी अर्थात लाइफ ट्रांसफॉर्मेशन सेंटर प्रकृति से जुड़ा हुआ है। वर्तमान समय में जिस प्रकार प्रकृति का ह्रास हो रहा है, उससे संबंधित विचार भी इस पुस्तक में व्यक्त किए गए हैं।

कार्यक्रम के प्रस्ताविक वक्तव्य में मुकुंद हिरवे ने कहा कि रामायण से जुड़े कई प्रश्नों के सार्थक और प्रमाणिक उत्तर इस पुस्तक में मिलते हैं। यह पुस्तक सीता माता को केवल पारंपरिक कथा तक सीमित न रखकर नारायणी देवी के अवतार के रूप में प्रस्तुत करती है। जब मानव प्रकृति से दूर होता जा रहा था, तब नई संस्कृति की स्थापना के लिए सीता माता श्रीराम के साथ पृथ्वी पर अवतरित हुईं।

तन्मय गाडगीळ और शिवानी हिरवे ने लेखिका एवं पुस्तक का परिचय कराया। कार्यक्रम का संचालन समन्वयक मुकुंद हिरवे ने किया तथा डॉ. मिलिंद पात्रे ने आभार व्यक्त किया।

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