
पुणे में ‘सुवर्णद्वीप’ पुस्तक का लोकार्पण, इंडोनेशिया में भारतीय संस्कृति के प्रभाव पर प्रकाश
रिपोर्ट: विशाल समाचार
स्थान: पुणे। महाराष्ट्र
भारतीय संस्कृति केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के बाहर भी उसका व्यापक प्रभाव देखने को मिलता है। इसका उत्कृष्ट उदाहरण इंडोनेशिया है, जहां आज भी रामायण और महाभारत जैसी भारतीय परंपराएं सांस्कृतिक रूप से जीवंत हैं। यह विचार ज्येष्ठ पुरातत्व विशेषज्ञ डॉ. गो. बं. देगलूरकर ने व्यक्त किए।
भांडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में ‘सुवर्णद्वीप : हिंदू बुद्धिस्ट किंग्डम्स ऑफ एन्शंट इंडोनेशिया’ पुस्तक का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम में आईसीएचआर के पूर्व अध्यक्ष डॉ. ए. पी. जामखेडकर ने पुस्तक का विमोचन किया, जबकि अध्यक्षता डॉ. गो. बं. देगलूरकर ने की।
इस अवसर पर लेखिका संगीता चाफेकर ने बताया कि भारतीय संस्कृति का प्रसार आक्रमण के माध्यम से नहीं, बल्कि व्यापार, धर्म, दर्शन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से हुआ। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपराएं संवादात्मक हैं, जो स्थानीय संस्कृतियों के साथ मिलकर विकसित हुईं।
ऋता उंबरजे ने जावा और बाली द्वीपों में भारतीय संस्कृति के प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि रामायण और महाभारत की कथाएं वहां की कला और शिल्प में आज भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।
डॉ. अंबरीष खरे ने इंडोनेशिया में भाषा, कला, स्थापत्य और शिलालेखों में भारतीय संस्कृति के प्रभाव पर प्रकाश डाला। वहीं विभा ओक ने पुस्तक के अनुवाद की चुनौतियों और भारतीय सांस्कृतिक विरासत की व्यापकता पर चर्चा की।
कार्यक्रम का संचालन मंजिरी शहाणे द्वारा किया गया।



