
सनी देओल के बयान पर उठे सवाल, सोशल मीडिया को ‘बकवास’ कहने पर तीखी प्रतिक्रिया
रिपोर्ट विशाल समाचार
स्थान नई दिल्ली
नई दिल्ली। अभिनेता और सांसद रहे सनी देओल के सोशल मीडिया पर लोगों की टिप्पणियों को लेकर दिए गए बयान के बाद बहस तेज हो गई है। उनके बयान पर सवाल उठाते हुए सोशल मीडिया यूजर्स का कहना है कि आम जनता को अपनी बात रखने और जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।
सनी देओल को एक बड़े कलाकार के तौर पर सम्मान देने की बात कहते हुए सवाल उठाया जा रहा है कि सोशल मीडिया पर सरकार, महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और अन्य जनहित के मुद्दों पर सवाल उठाना आखिर किस तरह ‘बकवास’ हो सकता है।
आलोचकों का कहना है कि सोशल मीडिया के विस्तार ने आम लोगों को अपनी बात सार्वजनिक रूप से रखने का मंच दिया है। इससे पहले सार्वजनिक विमर्श में नेताओं, अभिनेताओं और अन्य चर्चित चेहरों की ही अधिक मौजूदगी रहती थी। अब आम नागरिक भी अपनी राय रखने के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों से उनके काम का हिसाब मांग सकता है।
इसी क्रम में सनी देओल के राजनीतिक कार्यकाल को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। वह वर्ष 2019 में गुरदासपुर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए थे। उनके संसदीय प्रदर्शन को लेकर उपलब्ध आंकड़ों का हवाला देते हुए आलोचक पूछ रहे हैं कि संसद में उन्होंने जनता के मुद्दों को कितनी मजबूती से उठाया।
वायरल दावे में सनी देओल की संसद में 17 प्रतिशत उपस्थिति, शून्य बहस, शून्य प्रश्न और शून्य प्राइवेट मेंबर बिल का उल्लेख किया जा रहा है। हालांकि, ऐसे आंकड़ों को प्रकाशित करने से पहले आधिकारिक संसदीय रिकॉर्ड से इनकी पुष्टि किया जाना जरूरी है।
सवाल यही है कि अगर जनता सोशल मीडिया पर अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछती है, तो उसे ‘बकवास’ कहकर खारिज करने के बजाय क्या उन सवालों का जवाब देना ज्यादा लोकतांत्रिक रास्ता नहीं होगा?
कलाकार का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन लोकतंत्र में जनता को सवाल पूछने और अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांगने का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है।



