फर्जी स्कूल, सैलरीबाज शिक्षक और खामोश प्रशासन: शिक्षा सुधार या संरक्षण नीति?
उत्तर प्रदेश के इटावा ज़िले के खंड ब्लांक जसवंतनगर से आ रही शिक्षा तंत्र की हकीकत चौंकाने वाली ही नहीं, बल्कि शर्मनाक भी है। ऐसे सैकड़ों सरकारी स्कूल वर्षों से चल रहे हैं, जिनमें छात्र नाम मात्र के हैं, लेकिन शिक्षकों का वेतन नियमित जारी है। यह कोई गुप्त बात नहीं — इन स्कूलों की शिकायतें ज़िला स्तर से लेकर लखनऊ तक भेजी गईं, स्थानीय अखबारों में बार-बार छपीं, धरना-प्रदर्शन तक हुए — फिर भी कार्रवाई का न होना, अपने आप में एक बड़ा सवाल है।
दरअसल, ये सिर्फ फर्जी स्कूल नहीं — बल्कि एक संगठित वेतन लूट तंत्र का हिस्सा बन चुके हैं।
यह हाल तब है जब सरकार प्रदेश भर में लगभग 90% सरकारी स्कूलों को बंद करने की योजना पर काम कर रही है। दावा किया जा रहा है कि “छात्र संख्या कम है”, इसलिए स्कूलों को मर्ज किया जाएगा। लेकिन क्या सरकार को पहले इन ‘भूतिया स्कूलों’ पर ध्यान नहीं देना चाहिए, जहाँ छात्र हैं ही नहीं, फिर भी वेतन जारी है?
निरीक्षण की खानापूरी, बच्चे उधा
सबसे खतरनाक पहलू यह है कि जब ऐसे स्कूलों में कभी-कभार विभागीय निरीक्षण की सूचना मिलती है, तो दिखावे के लिए दूसरे स्कूलों से टैम्पो भर-भर कर बच्चे बुला लिए जाते हैं। निरीक्षण के समय नकली उपस्थिति और ‘सब कुछ ठीक है’ जैसी फर्जी रिपोर्टें जिला कार्यालयों से होते हुए राजधानी तक समर्पित कर दी जाती हैं।
यह सब जानते-बूझते होता है, और इसकी तस्वीर कहावत की तरह बन चुकी है –
“चना जोर गरम, बाबू मलाई मजेदार!”
यानी शिक्षा नहीं, सिर्फ खानापूर्ति और मलाईखोरी।
मीडिया भी सुरक्षित नहीं इन स्कूलों में यदि कोई मीडियाकर्मी सच्चाई उजागर करने पहुंचता है, तो उन्हें रोकने के लिए स्थानीय गुंडों की तैनाती रहती है। यानी, स्कूल अब शैक्षिक संस्थान नहीं रहे — वे अब “संरक्षित कमाई केंद्र” बन चुके हैं, जिनका संरक्षण कुछ भीतर तक फैले अधिकारियों और रसूखदारों से मिलता है।
प्रशासन की खामोशी, सरकार की जिम्मेदारी
प्रशासन इस पूरे खेल से अंजान नहीं है। असल में, इसी खामोशी ने फर्जीवाड़े को मजबूत किया है। जो शिक्षक बिना पढ़ाई के तनख्वाह उठा रहे हैं, उन्हें पता है कि न कोई उन्हें टोकने आएगा, न कोई ट्रांसफर होगा, न कार्रवाई।
और यही सबसे बड़ा खतरा है — जब व्यवस्था लाचार नहीं, बल्कि मौन साजिशकर्ता बन जाए।
समाधान की राह,अगर सरकार सच में “शिक्षा सुधार” चाहती है, तो उसे दिखावे की योजनाओं से आगे बढ़कर ज़मीनी सच्चाई से टकराना होगा:
हर जिले में “छात्रविहीन स्कूलों” की सूची सार्वजनिक की जाए,
निरीक्षण की प्रक्रिया पारदर्शी और वीडियोग्राफ्ड हो,
फर्जी उपस्थिति पर कड़ी कार्रवाई की जाए
और मीडिया की सुरक्षा की गारंटी सुनिश्चित हो।
वरना यह शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि वेतन बचाने वालों और भ्रष्टाचार को ढकने वालों की राजनीतिक योजना ही कहलाएगी।
(विशाल समाचार संपादकीय टीम)
✍️ शिक्षा व्यवस्था पर यह सवाल हम बार-बार उठाएंगे — क्योंकि देश के भविष्य का सवाल है।

