
लोकतंत्र की रीढ़ ‘मतदाता’ राजा ख़तरे में!
वीवीपैट नहीं, बैलेट पेपर से हों चुनाव — बसपा महासचिव डॉ. हुलगेश चलवादी की माँग
‘ईवीएम हटाओ, लोकतंत्र बचाओ’ का पुनरुच्चार
पुणे, राज्य में दिवाली के बाद होने वाले स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के चुनाव ईवीएम पर कराने की तैयारी सरकार ने शुरू कर दी है। खास बात यह है कि इन चुनावों में वीवीपैट का उपयोग नहीं किया जाएगा। लोकतंत्र की रीढ़ ‘मतदाता’ के अधिकारों पर खतरा मंडरा रहा है और राज्य चुनाव आयोग व सत्ता पक्ष की यह कार्यप्रणाली संदेह और भ्रम को और बढ़ाने वाली है। इससे मतदाताओं के बहुमूल्य मत चोरी होने की आशंका गहराती है।
ऐसे में न तो वीवीपैट और न ही ईवीएम, बल्कि सीधे साधे बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाएं — यह सशक्त मांग बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश महासचिव, पश्चिम महाराष्ट्र ज़ोन के मुख्य प्रभारी एवं पूर्व नगरसेवक डॉ. हुलगेश चलवादी ने सोमवार (11 अगस्त) को रखी।
उन्होंने इस अवसर पर ‘ईवीएम हटाओ, लोकतंत्र बचाओ’ के नारे का पुनरुच्चार करते हुए कहा कि देशवासियों के मन में ईवीएम के प्रति शुरू से ही अविश्वास है। “नागरिकों का, नागरिकों के लिए, नागरिकों द्वारा” — इस लोकतांत्रिक सिद्धांत के तहत यदि 85% नागरिक ईवीएम पर भरोसा नहीं करते, तो सरकार क्यों इसे चुनावी प्रक्रिया में थोप रही है? डॉ. चलवादी ने सवाल उठाया कि जब दुनिया के बड़े-बड़े देशों ने ईवीएम को नकार दिया, तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में इसे थोपना समझ से परे है। पारदर्शिता के अभाव में बैलेट पेपर ही सही विकल्प है, उन्होंने दावा किया।
बसपा नेता ने कहा कि अब तक किसी भी सरकार ने चुनावी पारदर्शिता के लिए ठोस कदम नहीं उठाए। इसके विपरीत, सत्ता का दुरुपयोग करते हुए बहुजनों के नाम मतदाता सूची से गायब करना, उनके मत चोरी करना और संविधान निर्माता भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा प्रदत्त अधिकारों का हनन किया गया है। अब स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के चुनाव में भी वंचित, उपेक्षित और शोषित वर्ग को मतदान से वंचित रखने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने विशेषकर बहुजन समाज से सतर्क रहने की अपील की।
प्रभाग पुनर्गठन के मुद्दे पर डॉ. चलवादी ने कहा कि अब तक हर पाँच वर्ष में नगर निगम के वार्ड पुनर्गठन की परंपरा थी, लेकिन इस बार 2017 की प्रभाग संरचना के अनुसार ही चुनाव कराए जा रहे हैं। जबकि जनसंख्या के आधार पर प्रभागों का पुनर्गठन समय की मांग है। इसे भौगोलिक दृष्टिकोण से तैयार किया जाना चाहिए, ताकि जमीनी स्तर से आए नेतृत्व को अवसर मिल सके और संविधान के मूल सिद्धांतों की पूर्ति हो।



