संपादकीय

राजनीति की भाषा कितनी गिरे?

“राजनीति की भाषा कितनी गिरी?”

 

भारतीय लोकतंत्र में विचारों की टकराहट स्वाभाविक है। असहमति और बहस लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन जब राजनीति का स्तर गिरकर किसी के परिवार, खासकर मां-बहन-बेटी तक आ जाए, तो यह लोकतंत्र नहीं, पतन की निशानी है।

 

आज कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं कि उन्होंने प्रधानमंत्री की मां पर अपमानजनक टिप्पणी की। 1947 से अब तक चाहे कितनी भी कड़ी राजनीति हुई हो, क्या कभी किसी ने विरोधी दल के नेताओं की मां को गाली दी? विपक्ष करना है, सत्ता को चुनौती देनी है, लेकिन परिवार की गरिमा को ठेस पहुँचाना कहां की राजनीति है?

 

राहुल गांधी का राजनीतिक सफर ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के नाम से शुरू हुआ। लेकिन देश ने देखा कि यह यात्रा बयानबाजी, फोटोशूट और विवादों तक सिमट गई। कई तस्वीरों और हरकतों ने उनके संस्कार पर सवाल खड़े किए। शादीशुदा महिला को गले लगाना, संसद में असंसदीय हरकतें—ये किस सभ्यता और लोकतांत्रिक मर्यादा का हिस्सा हैं? संसद अध्यक्ष तक को चेतावनी देनी पड़ी।

 

बिहार में रैली के दौरान राहुल गांधी ने पीएम मोदी की मां को गाली दी। और यह वही जगह थी जहाँ माता जानकी सीता का पवित्र जन्मस्थान है। एक पवित्र स्थल को भी कलंकित करना लोकतंत्र और संस्कृति दोनों पर वार है।

 

इतिहास गवाह है कि जब भी राजनीति ने व्यक्तिगत गरिमा को लांघा है, जनता ने कड़ा सबक दिया है। सवाल केवल राहुल गांधी का नहीं है, यह सवाल है कि क्या लोकतंत्र अब गाली और अपमान पर टिका रहेगा?

 

हमारा स्पष्ट मत है—किसी भी दल या नेता को विचारों पर प्रहार करने का हक़ है, लेकिन मां-बहन-बेटी तक पहुंचना निंदनीय है, और भारतीय संस्कृति व लोकतांत्रिक मर्यादा पर चोट है। सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग को इस प्रवृत्ति पर संज्ञान लेना चाहिए।

 

नेता अगर अपनी मां का सम्मान नहीं कर सकते, तो दूसरों की मां को गाली देने की हिम्मत कैसे कर सकते हैं? जनता अब यही सवाल पूछ रही है—

“क्या राजनीति अब मर्यादा से बड़ी हो गई है?”

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