इटावा में भ्रष्टाचार का साम्राज्य!
सैयाँ भये कोतवाल, अब डर काहे का!
इटावा एक ऐसा जिला बन चुका है जहाँ भ्रष्टाचार ही नियम और ईमानदारी ही अपराध लगने लगी है। जनता की नज़र में यह कड़वी सच्चाई है कि यहाँ वही अधिकारी और कर्मचारी विभागों की गद्दी सँभाले रहते हैं जो भ्रष्टाचार के घाघ खिलाड़ी हैं। चाहे नगर पालिका की टेंडर प्रक्रिया हो, शिक्षा विभाग की नियुक्तियाँ हों, स्वास्थ्य सेवाओं का खेल हो या राजस्व विभाग की वसूली — हर जगह लूट और धांधली का कारोबार फल-फूल रहा है।
शिकायतें और साक्ष्य, लेकिन कार्रवाई कहाँ?
यह कोई छुपा सच नहीं है कि इटावा में अलग-अलग विभागों के भ्रष्टाचार के खिलाफ कई बार शिकायतें दर्ज हुई हैं। ठोस साक्ष्य भी मौजूद हैं। लेकिन विडंबना यह है कि कार्रवाई तो दूर, जाँच तक शुरू नहीं होती। फाइलें बंद दराज़ों में पड़ी रहती हैं और समय बीतने के साथ मामला ठंडा कर दिया जाता है। जनता सवाल पूछे तो जवाब मिलता है — “कार्यवाही चल रही है।” हकीकत में यह कार्यवाही भ्रष्टाचारियों को बचाने और समय निकालने की चाल होती है।
जब रक्षक ही भक्षक बन जाएँ?
इटावा में कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है —
“सैयाँ भये कोतवाल, अब डर काहे का।”
जब कानून और व्यवस्था के रखवाले ही भ्रष्टाचार के भागीदार बन जाएँ तो फिर डर किसका रहेगा? यही कारण है कि विभागीय अफसर बेखौफ़ होकर लूट की दुकान चलाते हैं और जनता की गाढ़ी कमाई को डकार जाते हैं।
जिला प्रशासन की चुप्पी यह सबसे बड़ा सवाल है कि जिला प्रशासन क्यों मौन साधे हुए है?क्या प्रशासनिक अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव है?क्या बड़े अफसरों की मिलीभगत भ्रष्टाचारियों को ढाल प्रदान कर रही है?
या फिर व्यवस्था इतनी सड़ चुकी है कि ईमानदारी से कार्रवाई करने का साहस ही खत्म हो गया है।
अगर उच्च अधिकारियों तक मजबूत पकड़ न होती तो वर्षों से एक ही गिरोह विभागों को अपनी जेब की जागीर बनाकर कैसे बैठा रह सकता था?
जनता का भरोसा टूट रहा है
जब जनता बार-बार शिकायत करके भी न्याय नहीं पाती, तो उसका भरोसा प्रशासन से उठ जाता है। यही कारण है कि इटावा में लोग अब खुलेआम कहते हैं —
“यहाँ शिकायत मत करो, कुछ होना नहीं है।”
यह स्थिति लोकतंत्र और सुशासन दोनों के लिए खतरनाक संकेत है। क्योंकि जनता और प्रशासन के बीच भरोसे का पुल टूट जाए तो फिर अराजकता को फैलने से कोई नहीं रोक सकता।
भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी?
नगरपालिका की टेंडर प्रक्रिया इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सस्ती दरों पर काम देने के नाम पर चेयरपर्सन से जुड़ी फर्मों को फायदा पहुँचाया जाता है। शिक्षा विभाग में फर्जी स्कूल और फर्जी उपस्थिति पत्रक खुलेआम चल रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग में दवाओं की सप्लाई से लेकर मशीनों की खरीद तक सबमें कमीशनखोरी का खेल है। वन विभाग, विकास भवन और राजस्व विभाग में आम किसान की ज़मीन और अधिकार “मुठ्ठी गर्म” किए बिना सुरक्षित नहीं।
अब वक्त जवाबदेही का
इटावा को भ्रष्टाचार के इस दलदल से निकालने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे।
जाँच एजेंसियों की निष्पक्ष कार्रवाई — शिकायतों पर तुरंत एफआईआर और चार्जशीट।
जिम्मेदार अफसरों की जवाबदेही तय हो — कुर्सी पर बैठे-बैठे चुप्पी साधने वालों को भी कटघरे में खड़ा करना होगा।
लोकायुक्त और सतर्कता आयोग की निगरानी — ताकि राजनीतिक और विभागीय दबाव से मुक्त जाँच हो सके।
जनभागीदारी और पारदर्शिता — हर टेंडर, हर नियुक्ति और हर खर्च का विवरण सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड होना चाहिए।
अगर अब भी चुप्पी रही…
अगर प्रशासन ने अब भी आँखें मूँद लीं तो इटावा में भ्रष्टाचार “प्रथा” बन जाएगा। आने वाली पीढ़ी इसे सामान्य मानने लगेगी। यह सिर्फ इटावा ही नहीं, पूरे प्रदेश के लिए शर्मनाक होगा।



