
‘वसुधैव कुटुंबकम’ अंधविश्वास नहीं, हिंदुत्व का सर्वोच्च बिंदु – संजय उपाध्ये
सर्वपितृ अमावस्या पर सामूहिक तर्पण संस्कार विधि संपन्न
पुणे:प्रत्येक हिंदू को अपनी संस्कृति के संरक्षण के लिए शास्त्रों का सहारा लेना आवश्यक है। यदि कृतज्ञता भाव को जपकर रखा गया तो ही संस्कृति सुरक्षित रहेगी। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि हिंदुत्व का सर्वोच्च बिंदु है। यह विचार वरिष्ठ लेखक व कवि संजय उपाध्ये ने व्यक्त किए।
अरुंधती फाउंडेशन और हेरिटेज क्लब की ओर से सर्वपितृ अमावस्या के अवसर पर आयोजित ‘सामूहिक तर्पण संस्कार विधि’ कार्यक्रम में वे बोल रहे थे। इस अवसर पर श्री देवदेवेश्वर संस्थान के न्यासी रमेश भागवत, अरुंधती फाउंडेशन के हिमांशु गुप्ते, आदित्य गुप्ते, उमेश पोटे, उद्योगपति मयूरेश भिसे समेत अनेक मान्यवर उपस्थित थे।
संजय उपाध्ये ने कहा कि हिंदू समाज को अपनी संस्कृति बचाने की अब आवश्यकता है। भक्तिभाव के साथ शास्त्रों की गहराई समझना जरूरी है। उन्होंने कहा, “इतिहास बदलता है तो भूगोल भी बदल जाता है, लेकिन मनुष्य इतिहास भूल जाता है और बदले हुए भूगोल को भी नज़रअंदाज़ करता है। स्वतंत्रता के बाद साक्षरता की धारणाएं बदलीं, जिससे राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय अस्मिता के प्रति उपेक्षा देखने को मिली। अब घर-घर से जागरूक प्रयास होने चाहिए। तर्पण विधि केवल श्रद्धा और स्मरण नहीं बल्कि संकल्प सिद्धि का भी विषय है।”
उन्होंने आगे कहा कि आज के युग में लोग संकुचित विचारों में बंधकर आत्मकेंद्रित हो गए हैं। ऐसे समय में हिंदू संस्कृति के प्रचार-प्रसार हेतु हर व्यक्ति को समय देना आवश्यक है।
अरुंधती फाउंडेशन के आदित्य गुप्ते ने कहा कि पिछले बारह सौ वर्षों में हिंदू समाज पर अनेक आक्रमण हुए, जिनमें तीस करोड़ से अधिक लोगों ने वीरगति पाई। उनका सामूहिक तर्पण करने वाला कोई नहीं रहा। इसी कृतज्ञ भाव से संस्था हर वर्ष सामूहिक तर्पण विधि का आयोजन करती है। इसका उद्देश्य हिंदू संस्कृति का संरक्षण है।
रमेश भागवत ने धर्मप्रचार के लिए सप्ताह में कम-से-कम एक दिन सामूहिक प्रार्थना आयोजित करने और इसमें सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया।
इस अवसर पर दिवंगत इतिहासकार गजानन मेहंदळे को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम का प्रास्ताविक हिमांशु गुप्ते ने किया तथा संचालन विनय वाघमारे ने किया। समापन ‘ही इज़ स्टोरी ऑफ इतिहास’ नामक सत्य घटना पर आधारित फिल्म के प्रदर्शन से हुआ।


