जीएसटी बचत उत्सव : उत्सव नहीं, जनता के दर्द पर परदा
विशाल समाचार | संपादकीय
22 सितंबर 2025 को पूरे भारत में “जीएसटी बचत उत्सव” का शोर मचाया गया। सरकार ने इसे सुधार और उपलब्धि का पर्व बताया, पर हकीकत इससे अलग है। करदाता के करोड़ों रुपये चमक-दमक और प्रचार में बहा दिए गए।
जीएसटी 2017 में लागू हुआ था। उस वक्त वादा किया गया — एक राष्ट्र, एक टैक्स। कहा गया कि कर प्रणाली आसान और पारदर्शी होगी। लेकिन पिछले आठ वर्षों में छोटे व्यापारियों के लिए जटिल रिटर्न, उपभोक्ताओं के लिए महंगाई, और आम आदमी के लिए टैक्स बोझ ही बढ़ा है। ऐसे में उत्सव मनाने का औचित्य क्या है?
विरोधाभास और भी गहरा है — कोई कह रहा है यह 7 दिन का भाजपा अभियान है, तो कहीं 100 दिन की योजना की बात सामने आ रही है। असल सवाल यह है कि क्या जनता को वाकई राहत मिलेगी, या फिर यह सिर्फ राजनीतिक प्रचार का एक नया चेहरा है?
राज्यों और जिलों में शो-पीस कार्यक्रम किए जा रहे हैं, नेताओं की रैलियाँ और मार्केट-विज़िट हो रहे हैं। लेकिन जनता के जीवन में महंगाई जस की तस है। व्यापारियों की शिकायतें खत्म नहीं हुईं। और सबसे अहम — कर संग्रह बढ़ता जा रहा है, पर राहत का असर जेब तक नहीं पहुँच रहा।
सच यह है कि उत्सव नहीं, सुधार चाहिए। अगर जीएसटी को सचमुच जनता के हित में बदलना है तो इसे सरल और बोझमुक्त बनाना होगा। छोटे व्यापारियों की दिक़्क़तें कम करनी होंगी और रोज़मर्रा की वस्तुओं पर टैक्स का बोझ घटाना होगा। तभी यह “बचत उत्सव” अपने नाम को सार्थक करेगा।
अभी के हालात में यह आयोजन सिर्फ सरकारी तामझाम और दिखावे तक सीमित है — जनता की तकलीफ़ों पर परदा डालने वाला। सवाल साफ है : करोड़ों की बर्बादी के बीच आखिर किसका उत्सव मनाया जा रहा है — जनता का या सरकार का?



