
संशोधन का अर्थ सिर्फ शोधपत्र नहीं, बल्कि किसान के जीवन में बदलाव – कृषि मंत्री दत्तात्रय भरणे
पुणे, सोहन सिंह:महाराष्ट्र के कृषि मंत्री दत्तात्रय भरणे ने कहा कि राज्य के कृषि विश्वविद्यालयों को अपने अनुसंधान से ऐसे निष्कर्ष प्रस्तुत करने चाहिए, जो सीधे तौर पर किसानों की उत्पादन क्षमता, आय और टिकाऊ खेती में सुधार लाएं। उन्होंने स्पष्ट किया कि “संशोधन का मतलब केवल शोधपत्र नहीं, बल्कि किसान के जीवन में दिखाई देने वाला परिवर्तन है — यही उसकी असली कसौटी है।”
पुणे स्थित महाराष्ट्र राज्य अध्यापक विकास संस्थान में 29 से 30 अक्टूबर 2025 तक आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला
“महाराष्ट्र की कृषि अनुसंधान प्रणाली का पुनर्गठन : निष्कर्ष से प्रभाव तक (Redefining Agriculture Research Ecosystem in Maharashtra: From Outputs to Impact)” के उद्घाटन अवसर पर बोल रहे थे।
यह कार्यशाला महाराष्ट्र शासन, कृषि विभाग और महाराष्ट्र कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई है।
भरणे ने कहा कि राज्य का कृषि क्षेत्र जलवायु परिवर्तन, उत्पादन में कमी, बाजार की अनिश्चितता और तकनीक के धीमे उपयोग जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में कृषि विश्वविद्यालयों को चाहिए कि वे अपने अनुसंधान को पुस्तकीय सीमाओं से बाहर निकालकर किसानों, किसान उत्पादक कंपनियों और कृषि उद्योगों के लिए व्यावहारिक समाधान तैयार करें। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह कार्यशाला कृषि अनुसंधान और प्रशिक्षण में नए आयाम और नवोन्मेषी दृष्टिकोण प्रस्तुत करेगी।
कृषि मंत्री ने कहा —“कृषि अनुसंधान का केंद्र बिंदु किसान होना चाहिए। प्रयोगशालाओं में विकसित हर तकनीक तभी सार्थक है, जब वह किसान के खेत में उपयोगी सिद्ध हो और उसकी आय में वृद्धि करे। अब हम ‘निष्कर्ष से प्रभाव’ की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। शोध का वास्तविक मूल्यांकन तब होगा, जब उसका परिणाम किसान के समृद्ध जीवन में दिखाई दे। महाराष्ट्र की कृषि अनुसंधान प्रणाली अब प्रयोगशालाओं से निकलकर खेतों और बाजार तक प्रभाव उत्पन्न करने के युग में प्रवेश कर रही है।”
उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब अनुसंधान केवल रिपोर्ट तक सीमित न रहकर किसान के चेहरे पर मुस्कान के रूप में दिखाई दे। यही हमारी सफलता की सच्ची पहचान होगी।
भरणे ने आगे कहा कि अब आवश्यकता है कि कृषि अनुसंधान पुस्तकों और प्रयोगशालाओं से बाहर आकर किसानों तक पहुंचे, उनके अनुभवों और समस्याओं पर आधारित व्यावहारिक समाधान दे। इस कार्यशाला का उद्देश्य कृषि विश्वविद्यालयों को शोध की कमियों, प्राथमिकताओं और प्रभाव-आधारित दृष्टिकोण से अवगत कराना है। इससे शोध प्रस्ताव लेखन में सुधार, संस्थागत सहयोग को मजबूती, और डेटा व आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग में जागरूकता बढ़ेगी।
कार्यक्रम में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक और केंद्रीय कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव डॉ. मांगीलाल जाट, राज्य कृषि राज्यमंत्री एड. आशीष जयस्वाल, महाराष्ट्र कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान परिषद के उपाध्यक्ष तुषार पवार, महासंचालक वर्षा लड्डा-उंटवाल, उपसचिव प्रतिभा पाटिल, श्रीकांत आंडगे, वसंतराव नाइक मराठवाड़ा कृषि विश्वविद्यालय, परभणी के कुलपति डॉ. इंद्र मणी, कोकण कृषि विश्वविद्यालय, दापोली के कुलपति डॉ. संजय भावे, महात्मा फुले कृषि विश्वविद्यालय, राहुरी एवं डॉ. पंजाबराव देशमुख कृषि विश्वविद्यालय, अकोला के कुलपति डॉ. शरद गडाख, परिषद के संचालक डॉ. किशोर शिंदे, कृषि वैज्ञानिक, विभागीय अधिकारी, किसान उत्पादक कंपनियों के प्रतिनिधि तथा प्रगतिशील किसान उपस्थित रहे।



