युवा मधुमेहीयों को अपने आँखों की देखभाल करना जरूरी : विशेषज्ञ
पुणे, : किशोरवयीन और युवा व्यक्तियों में टाईप 2 मधुमेह के बढते प्रमाण को देखते हुए इसके निगडीत जटिलताएँ जीवन में बहुत पहले निर्माण हो सकती है. अगर शुगर लेव्हल को ठीक से नियंत्रित नहीं किया तो इसका आँखों पर बुरा असर पड़ सकता है. इसलिए युवा मधुमेही मरीजों ने अपने आँखों का विशेष ध्यान रखना चाहिए ऐसी राय विशेषज्ञों ने व्यक्त की.
मधुमेह के बारें में अब समाज में जागरूकता बढी है, लेकिन बहुत से लोग आँखों पर प्रभावों के बारे में पर्याप्त रूप से जागरूक नहीं है.14 नवंबर को जागतिक मधुमेह दिन के अवसर पर डायबेटिक रेटिनोपॅथी इस दुर्लक्षित जटिलता की ओर ध्यान आकर्षित करना जरूरी है. यह भारत में प्रौढ़ व्यक्तींयों में अंधेपन के प्रमुख कारणों में से एक है.
पीबीएमए के एच.व्ही.देसाई आय हॉस्पिटल की रेटिना विशेषज्ञ डॉ.रश्मी काशिकर ने कहा की, हमारे क्लिनिक मेें आनेवाले आधे से अधिक मधुमेहीं मरीज इस बात से अनभिज्ञ है की,उनकी आँखे प्रभावित हो सकती हैं,इसलिए अधिक जागरूकता और कृती की आवश्यकता है.
उन्होंने आगे कहा की, टाईप 1 मधुमेहीं मरीजों को निदान होने के बाद 5 वर्षों के भीतर अपनी आंखों की जांच करवानी चाहिए,जबकि टाईप 2 मधुमेह मरीजों ने निदान के बाद नेत्र जाँच करनी आवश्यक है. खासकर किडनी या अन्य जटिलताओं से पीड़ित लोग जो डायलिसिसपर है, उनको अपने डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित रूप से अपनी आँखो की जाँच करनी चाहिए. जब रक्त शर्करा का स्तर लगातार ज्यादा रहता है,तो यह रेटिना में स्थित छोटी रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुँचा सकता है,जो आँख मे पीछे और प्रकाश के प्रति संवेदनशील होती है. इस स्थिती को डायबेटिक रेटिनोपॅथी कहा जाता है. रेटिना में रक्त वाहिकाओं को नुकसान होने से धुंधली दृष्टि, आँखों से रक्तस्त्राव,आँखों से सामने काले डॉटस (फ्लोटर्स) या उपचार न करनेपर अंधापन भी हो सकता है. शीघ्र निदान व समय पर उपचार महत्त्वपूर्ण है,लेकिन बहुत से लोग इस स्थिती से अनजान है और इस स्थिति के बारें में जानकारी न होने से इस स्थिती का उपचार तब तक संभव नहीं जब तक यह अगले पडाव तक न पहुँच जाए.
डॉ.काशीकर ने आगे कहा की, युवा भारतीय आबादी में मधुमेह का प्रमाण बढते हुए,प्रत्येक युवा मधुमेहींयों ने वर्ष में कम से कम एक बार कॉम्प्रेहेंसिव्ह डायलेटेड आय एक्झाम करनी चाहिए. युवा मधुमेहींयों में लंबे समय तक रक्त शर्करा का प्रमाण जरूरत से ज्यादा होने से डायबेटिक रेटिनोपॅथी की तीव्रता और उससे जुडी जटिलताओं की जोखीम को भी बढाता है.
जागतिक आरोग्य संघटना के अनुसार 25 वर्ष से कम आयु में निदान किए गए टाईप 1 व टाईप 2 मधुमेहींयों को युवा मधुमेही माना जाता है.
इसके बारें में जागरूकता की कमी को देखते हुए और अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचने के उद्देश्य से हम विशेष रूप से बस्तियों में निदान जाँच कर रहे है. वर्तमान में पीसीएमसी व चाकण परिसर की बस्तियों में आँखों की जाँच के लिए हमारी मोबाईल व्हॅन्स कार्यरत है और हर रोज 30 से 40 लोगों की जाँच की जाती है, यह जानकारी एच.व्ही.देसाई आय हॉस्पिटल के वैद्यकीय संचालक डॉ.कुलदीप डोळे ने दी.


