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खाकी का सम्मान या भौकाल का प्रदर्शन?

खाकी का सम्मान या भौकाल का प्रदर्शन?

 

उत्तर प्रदेश पुलिस में रेडियो ऑपरेटर की ट्रेनिंग पूरी कर गांव लौटे एक जवान के स्वागत का वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। वीडियो में दर्जनों चारपहिया और दोपहिया वाहनों का लंबा काफिला दिखाई दे रहा है। एसयूवी वाहन की छत से बाहर निकलकर पुलिसकर्मी लोगों का अभिवादन कर रहा है, जबकि पीछे फिल्मी गीतों के बीच समर्थकों का उत्साह देखने को मिल रहा है।

 

सरकारी नौकरी मिलना निश्चित रूप से किसी भी परिवार और गांव के लिए गर्व का विषय होता है। एक युवा का पुलिस सेवा में चयन होना सम्मान और बधाई का अवसर है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सम्मान और शक्ति प्रदर्शन के बीच की रेखा कहीं धुंधली तो नहीं हो रही?

 

आज देश के प्रधानमंत्री से लेकर कई राज्यों के मुख्यमंत्री तक अनावश्यक काफिलों, फिजूलखर्ची और दिखावे से बचने की बात करते हैं। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों, पर्यावरण संरक्षण और यातायात अनुशासन की चर्चा लगातार होती है। ऐसे समय में एक पुलिस जवान के स्वागत के लिए वाहनों का लंबा काफिला क्या उचित संदेश देता है?

 

खाकी वर्दी केवल अधिकार का प्रतीक नहीं, बल्कि अनुशासन, सादगी और जनता के प्रति जिम्मेदारी का भी प्रतीक है। पुलिसकर्मियों से समाज अपेक्षा करता है कि वे कानून और नियमों के पालन की मिसाल बनें। इसलिए जब खाकी वर्दी के साथ भव्य शक्ति प्रदर्शन जैसी तस्वीरें सामने आती हैं, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं।

 

यह लेख किसी व्यक्ति विशेष की उपलब्धि को कम आंकने के लिए नहीं है। युवा की सफलता सराहनीय है और उसका सम्मान होना भी चाहिए। लेकिन सम्मान और भौकाल के बीच का अंतर समझना भी उतना ही आवश्यक है। समाज में प्रेरणा का स्रोत बनने वाली वर्दी का गौरव सादगी, सेवा और अनुशासन से बढ़ता है, न कि वाहनों के लंबे काफिलों से।

 

प्रशासन को भी ऐसे आयोजनों पर स्पष्ट दिशा-निर्देश देने चाहिए ताकि भविष्य में सम्मान समारोह गरिमा के साथ हों और उनका संदेश समाज के लिए सकारात्मक बने।

 

— संपादकीय टिप्पणी, विशाल समाचार

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