
साक्षीभाव से जीने की कला सीखें : स्वामी कृष्ण चैतन्य
30वीं तत्त्वज्ञ संत ज्ञानेश्वर–तुकाराम स्मृति व्याख्यानमाला का शुभारंभ
पुणे (विशाल समाचार) आधुनिक जीवनशैली में अध्यात्म की गलत धारणा वाढती दिखाई देती है। आज मनुष्य भयवश अध्यात्म का सहारा लेता है। यदि वास्तविक अनुभव घ्याना हो तो पूर्णत्व, समत्व और साक्षीभाव से जीना आवश्यक है। मनुष्य वर्तमान में जीने के बजाय अतीत और भविष्य में उलझा रहता है, जो दुख का सबसे बड़ा कारण है। साक्षीभाव से जीना सीख लिया तो शांति और सुख संभव है — ऐसे विचार किमया आश्रम के संस्थापक स्वामी कृष्ण चैतन्य ने व्यक्त किए।
एमआयटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी, विश्वशांती केंद्र (आळंदी), माईर्स एमआईटी पुणे, भारत तथा संत ज्ञानेश्वर–तुकाराम स्मृति व्याख्यानमाला न्यास द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित 30वीं व्याख्यानमाला के प्रथम सत्र में ‘आधुनिक जीवन पद्धति और अध्यात्म’ विषय पर वे मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे। अध्यक्षता एमआयटी डब्ल्यूपीयू के संस्थापक अध्यक्ष एवं यूनेस्को अध्यासन प्रमुख विश्वधर्मी प्रो. डॉ. विश्वनाथ दा. कराड ने की।
कार्यक्रम में एमआयटी डब्ल्यूपीयू के कुलगुरु डॉ. आर.एम. चिटणीस, प्रो. गायकवाड तथा व्याख्यानमाला के समन्वयक डॉ. मिलिंद पात्रे उपस्थित थे।
स्वामी कृष्ण चैतन्य ने कहा कि अध्यात्म और विज्ञान दोनों का स्वरूप भिन्न है। स्वयं का विसर्जन अध्यात्म है, जिससे शांति और आनंद प्राप्त होता है। मौन और शांति का मार्ग ही ईश्वर तक ले जाता है, जबकि विज्ञान नई खोजों के माध्यम से मानव जीवन को आगे बढ़ाता है।
प्रातः सत्र के विचार
सुबह के सत्र में प्रसिद्ध गप्पाष्टककार डॉ. संजय उपाध्ये, किंकर विठ्ठल रामानुज और किंकर विश्वेशरैय्या आनंदा ने व्याख्यान दिए।
डॉ. उपाध्ये ने ‘मी, मेरे हट्ट और मनःशांति’ विषय पर बोलते हुए कहा कि त्रेतायुग से कलियुग तक संसार हट्ट पर ही चला है। हट्ट सुनना और न सुनना—दोनों विनाशकारी हो सकते हैं। जब हट्ट हक से ऊपर आ जाता है, तभी धर्म का उदय होता है। उन्होंने कहा कि आनंद और शांति के लिए ‘मैं’ से चिपका हट्ट छोड़ना आवश्यक है।
अंत में प्रो. दत्ता दंडगे ने आभार व्यक्त किया और कार्यक्रम का संचालन डॉ. मिलिंद पात्रे ने किया


