पूणे

उद्य का विश्व एआई पर नहीं, ज्ञानोबा–तुकोबा के मंत्र पर चलेगा:— विश्वास पाटील

उद्य का विश्व एआई पर नहीं, ज्ञानोबा–तुकोबा के मंत्र पर चलेगा:— विश्वास पाटील

 

30वीं तत्त्वज्ञ संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर–तुकाराम स्मृति व्याख्यानमाला का समारोप समारोह

 

पुणे: “आज की दुनिया एआई की ओर बढ़ रही है, लेकिन एआई तकनीक की अपनी सीमाएँ हैं। मानव बुद्धि सबसे महत्वपूर्ण है। आने वाला कल एआई पर नहीं, बल्कि ज्ञानोबा–तुकोबा के मंत्र पर चलेगा।”

ऐसे विचार वरिष्ठ साहित्यकार तथा 99वें अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के नियोजित अध्यक्ष विश्वास पाटील ने व्यक्त किए।

 

वे एमआइटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी, विश्वशांति केंद्र (आळंदी) और माईर्स एमआइटी, पुणे द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित 30वीं तत्त्वज्ञ संतश्री ज्ञानेश्वर–तुकाराम स्मृति व्याख्यानमाला के समारोप समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे।

 

कार्यक्रम की अध्यक्षता एमकेसीएल के वरिष्ठ सलाहकार एवं वैज्ञानिक डॉ. विवेक सावंत ने की। इस अवसर पर विश्वशांति केंद्र (आळंदी) एवं माईर्स एमआइटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी के संस्थापक अध्यक्ष प्रा. डॉ. विश्वनाथ दा. कराड, कार्याध्यक्ष डॉ. राहुल कराड, कुलगुरु डॉ. रविकुमार चिटणीस, प्र-कुलगुरु डॉ. मिलिंद पांडे तथा अधिष्ठाता डॉ. मिलिंद पात्रे उपस्थित थे।

समारोह में विश्वशांति के क्षेत्र में किए गए कार्यों के लिए उपस्थित सभी लोगों की ओर से डॉ. विश्वनाथ कराड का विशेष सम्मान किया गया। योगगुरु अनंत कोंडे और मारुति पाडेकर गुरुजी का भी मान्यवरों के हाथों सत्कार किया गया। इसी अवसर पर पीस स्टडीज़ की ओर से ‘सेंटर फॉर एक्सीलेंस इन संस्कृत एंड IRS स्टडीज़’ पाठ्यक्रम की पुस्तिका का प्रकाशन किया गया।

विश्वास पाटील ने अपने भाषण में कहा,

“माता जिजाऊ ने छत्रपति शिवाजी महाराज को विश्वशांति का आदर्श दिया। संतों के विचारों का उन पर गहरा प्रभाव था। शक्ति, युक्ति और भक्ति—इन तीनों के संगम से उन्होंने स्वराज्य की स्थापना की और मानव जाति के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। इसी कारण शिवाजी महाराज सर्वश्रेष्ठ राजा बने।”

कार्यक्रमाध्यक्ष डॉ. विवेक सावंत ने कहा,

“विज्ञान और अध्यात्म के बीच का अद्वैत—यही हमारी संत परंपरा का मूल है। इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य डॉ. कराड सरों ने किए हैं। आज बहु-विषयक शिक्षा की अत्यंत आवश्यकता है, इसी से भारत आत्मनिर्भर बनेगा। विद्यार्थियों को ‘स्व’ की खोज करना सिखाएं। स्व की खोज ही विश्वशांति का मार्ग है।”

प्रा. डॉ. विश्वनाथ दा. कराड ने कहा,

“भारतीय संस्कृति, परंपरा और दर्शन के संदेश को विश्वभर में फैलाने में इस व्याख्यानमाला की बड़ी भूमिका है। ज्ञानोबा–तुकोबा केवल टाळकुटे का विषय नहीं, बल्कि उत्तम जीवन जीने का मार्गदर्शन हैं। मनुष्य के रूप में समृद्ध होने का एकमात्र मार्ग संत मार्ग ही है।”

 

समारोह का स्वागत एवं प्रास्ताविक डॉ. आर. एम. चिटणीस ने किया।

सूत्रसंचालन डॉ. मिलिंद पात्रे ने किया तथा आभार डॉ. मिलिंद पांडे ने व्यक्त किए।

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