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इटावा में जनसुनवाई बना मज़ाक, शिकायतकर्ता से बिना संपर्क दो बार किया गया कागजी निस्तारण

इटावा में जनसुनवाई बना मज़ाक, शिकायतकर्ता से बिना संपर्क दो बार किया गया कागजी निस्तारण

मुख्यमंत्री पोर्टल से डीएम कार्यालय तक, जांच के नाम पर सिर्फ फाइल बंद करने का खेल

इटावा: विशाल समाचार संवाददाता 

योगी सरकार भ्रष्टाचार और जनसुनवाई को लेकर चाहे जितने बड़े दावे करे, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। इटावा जिले में मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर की गई शिकायतों का बिना जांच, बिना शिकायतकर्ता से संपर्क किए, कागजी निस्तारण कर दिया गया।

शिकायतकर्ता द्वारा 11 दिसंबर 2025 को मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर प्रथम अपील की गई थी, जिसे जिलाधिकारी इटावा के पोर्टल पर भेज दिया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि न तो किसी अधिकारी ने शिकायतकर्ता से फोन पर संपर्क किया, न ही किसी प्रकार की जांच की गई, इसके बावजूद शिकायत को “निस्तारित” दर्शा दिया गया।

यह कोई पहली बार नहीं है।

शिकायतकर्ता के अनुसार इससे पहले भी इसी प्रकार शिकायत को बिना जांच निस्तारित किया जा चुका है। यानी यह एक बार की चूक नहीं, बल्कि प्रशासनिक कार्यशैली बन चुकी है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि

👉 जब शिकायतकर्ता से बात ही नहीं हुई,

👉 जब कोई जांच रिपोर्ट मौजूद नहीं है,

तो निस्तारण किस आधार पर किया गया?

क्या जनसुनवाई पोर्टल सिर्फ आंकड़े सुधारने का माध्यम बन गया है?क्या जिला प्रशासन के कुछ अधिकारी मुख्यमंत्री कार्यालय को गुमराह करने का काम कर रहे हैं?यह मामला सीधे तौर पर जनसुनवाई व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। यदि शिकायतों का समाधान सिर्फ फाइल बंद कर देने से हो जाएगा, तो आम नागरिक आखिर न्याय की उम्मीद किससे करे?

शिकायतकर्ता ने अब मामले में सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से यह पूछने की तैयारी  कर ली है कि किस अधिकारी ने, किस जांच के आधार पर, शिकायत का निस्तारण किया। साथ ही मामले को लोकायुक्त/विजिलेंस तक ले जाने की भी तैयारी है।

प्रशासन को यह समझना होगा कि

👉अब शिकायतकर्ता डरने वालें नहीं है

👉 और न ही सवाल पूछने से पीछे हटेगा

अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस गंभीर मामले पर क्या जवाब देता है, या फिर हमेशा की तरह चुप्पी साध ली जाएगी।

> “हम प्रशासन से डरते नहीं,  सम जनमानस है सवाल पूछते रहेंगे।”— और हमारा अधिकार है।

 

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