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जसवंत नगर तहसील में समाधान नहीं, सिर्फ़ खानापूर्ति!

जसवंत नगर तहसील में समाधान नहीं, सिर्फ़ खानापूर्ति!

समाधान दिवस बना “व्यवधान दिवस”, एक भी शिकायत का मौके पर निस्तारण नहीं

इटावा | जसवंत नगर विशाल समाचार 

जसवंत नगर तहसील सभागार में आयोजित तथाकथित समाधान दिवस अब सवालों के घेरे में है। सूत्रों के अनुसार यह आयोजन समाधान से ज्यादा औपचारिकता और अव्यवस्था का प्रतीक बनकर रह गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मुख्य विकास अधिकारी अजय कुमार गौतम ने की, जिसमें कुल आठ शिकायतें दर्ज की गईं, लेकिन एक भी शिकायत का मौके पर निस्तारण नहीं हुआ।

सूत्र बताते हैं कि अधिकांश शिकायतें भूमि विवाद, अवैध कब्जा जैसी गंभीर प्रकृति की थीं, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के चलते फरियादियों को सिर्फ़ आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला। मौके पर उप जिलाधिकारी सत्यम जीत, तहसीलदार नेहा सचान, खंड विकास अधिकारी उदयवीर सिंह दुबे, एडीओ पंचायत देवेंद्र कुमार पाल एवं एसडीओ कृषि बलवीर सिंह मौजूद रहे, इसके बावजूद समाधान शून्य रहा।

पीली पर्ची भी नहीं, भरोसा कैसे?

सबसे गंभीर आरोप यह है कि कई शिकायतकर्ताओं को पीली पर्ची (रिसीविंग) तक नहीं दी गई। सूत्रों का दावा है कि कुछ शिकायतें रजिस्टर में चढ़ाने के बजाय लेखपालों द्वारा वहीं से लौटा दी गईं। सवाल उठता है कि जब शिकायत की कोई आधिकारिक रिसीविंग ही नहीं, तो समाधान का आधार क्या होगा?

एक व्यक्ति, पांच–पांच चार्ज!

सूत्रों के मुताबिक तहसील दिवस में प्रेम कुमार नामक व्यक्ति को एक साथ पांच-पांच चार्ज दिए गए हैं। आखिर किस आधार पर? जब आज के समय में एक टेबल का चार्ज ठीक से संभल नहीं पा रहा, तो पांच-पांच जिम्मेदारियां देना किस व्यवस्था की पोल खोलता है?

जब एक सज्जन ने प्रेम कुमार से उनके पदों के बारे में पूछा, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से बताने से इंकार कर दिया और कहा—

आप काम से काम रखो, नहीं बताएंगे।

यह जवाब प्रशासनिक पारदर्शिता पर सीधा सवाल खड़ा करता है।

बाहर से ही भगा दिए जाते हैं सैकड़ों फरियादी?

सूत्र यह भी बताते हैं कि सैकड़ों शिकायतकर्ताओं को तहसील परिसर के बाहर से ही लौटा दिया जाता है। जनपद इटावा में शिकायत पोर्टल पर झूठी आख्या लगाए जाने के आरोप भी पहले से लगते रहे हैं। फरियादी महीनों इंतजार करते रहते हैं कि शायद प्रशासन से फोन आए, लेकिन वह इंतजार ही बनकर रह जाता है।

समाधान दिवस या खानापूर्ति दिवस?

अब बड़ा सवाल यह है कि इसे तहसील समाधान दिवस कहा जाए या फिर खानापूर्ति दिवस?

जब न पर्ची मिले, न निस्तारण हो, न जिम्मेदारियों का खुलासा—तो जनता किस पर भरोसा करे?

प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि

शिकायतों को दर्ज न करने की जिम्मेदारी किसकी है?

एक व्यक्ति को कई-कई चार्ज देने का आधार क्या है?

 

आखिरकार किस आधार पर पांच-पांच चार्ज दिए गए? चार्ज देने वाला कौन अधिकारी हैं।उसकी भी जांच हो?

और आखिर समाधान दिवस जनता के लिए है या सिर्फ़ कागजी रिपोर्ट के लिए?

जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, जसवंत नगर का समाधान दिवस सवालों के कटघरे में ही रहेगा।

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