
सचिन पिळगांवकर के शायराना अंदाज़ और वैभव जोशी के ‘सोबतीचा करार’ ने जीता दिल
दिनभर सजी ‘आईना-ए-ग़ज़ल’ महफ़िल, उर्दू–मराठी शायरी और नग़मों का यादगार संगम
पुणे विशाल सिंह: बहुआयामी कलाकार सचिन पिळगांवकर ने अपनी बेहतरीन उर्दू अदायगी, ग़ज़ल, नज़्म और शेरों के जरिए श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। ‘मै कतराही सही, मेरा वजूद तो है…’ जैसी रचनाओं को आत्मविश्वास और ठहराव के साथ पेश करते हुए उन्होंने अपने भीतर के शायर और संवेदनशील कलाकार का प्रभावी परिचय दिया। वहीं, कवि-गीतकार वैभव जोशी की प्रस्तुति ‘सोबतीचा करार’ ने मराठी ग़ज़ल और कविता के रंगों से महफ़िल को शिखर तक पहुंचाया।
डाॅ. विनय वाईकर की स्मृति में आयोजित यह विशेष कार्यक्रम ‘आईना-ए-ग़ज़ल’ नवी पेठ स्थित एस. एम. जोशी सभागृह में दिनभर चला और प्रवेश सभी के लिए निःशुल्क रखा गया था। इस अवसर पर सचिन पिळगांवकर के हाथों डाॅ. वाईकर लिखित ‘आईना-ए-ग़ज़ल’ और ‘गुलिस्ता-ए-ग़ज़ल’ पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम में कवि वैभव जोशी, आयोजक अमित वाईकर, अपर्णा वाईकर, ग़ज़लकार सुरेशकुमार वैराळकर सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित थे।
‘अंदाज़-ए-शायरी’ सत्र में सचिन पिळगांवकर से अमित वाईकर ने संवाद साधा। उन्होंने बताया कि अभिनेत्री मीना कुमारी और शायर मजरूह सुल्तानपुरी के कारण उर्दू से उनका प्रेम गहरा हुआ। “उर्दू के चाहने वाले इतने ज़्यादा हैं कि इसे ग़ैर-मुस्लिम संभाले हुए हैं,” इस कथन पर सभागार तालियों से गूंज उठा। उन्होंने अपनी रचनाओं के साथ-साथ सामाजिक माध्यमों पर कटाक्ष करती हल्की-फुल्की नज़्में भी पेश कीं, जिन्हें श्रोताओं ने खूब सराहा।
महफ़िल की शुरुआत ‘मुशायरा ग़ज़लरंग’ से हुई, जिसमें वैभव जोशी, वैभव देशमुख, ममता सपकाळ और ज्ञानेश पाटील ने सादरीकरण किया। सूत्रसंचालन सुरेशकुमार वैराळकर ने किया। दूसरे सत्र ‘बज्म-ए-सुख़न’ में राजेश रेड्डी ने जीवन और समाज पर सोच को उकेरती ग़ज़लें सुनाईं, “किसी दिन ज़िंदगानी में करिश्मा क्यों नहीं होता…” जैसी पंक्तियों ने श्रोताओं को गहराई से छुआ।
तीसरे सत्र ‘नग़्मा-ए-ग़ज़ल’ में गायिका प्राजक्ता सावरकर शिंदे ने नासिर काज़मी, शकील बदायुनी, राजेश रेड्डी सहित प्रसिद्ध शायरों की ग़ज़लों के साथ वैभव जोशी की रचना भी पेश की। तबले पर महेश साळुंके, संवादिनी पर निनाद सोलापुरकर और वायलिन पर प्रभंजन पाठक की संगत ने प्रस्तुति को और प्रभावी बनाया।
समापन सत्र में वैभव जोशी की प्रस्तुति को श्रोताओं की भरपूर प्रतिक्रिया मिली। निनाद सोलापुरकर (कीबोर्ड), प्रसाद जोशी (ढोलक-पखवाज), समीर शिवगार (तबला), मिलिंद शेवरे (गिटार), दत्तप्रसाद रानडे (गायन) और संगीतकार डॉ. आशिष मुजुमदार की संगत ने महफ़िल को यादगार बना दिया। “सोबतीचा तरी करार करू…” से शुरू होकर “आयुष्याला घाबरण्याचा स्वभाव नाही आई” तक पहुँची यह शाम भैरवी के सुरों में सिमट गई।
शब्द, सुर और संवेदना के इस संगम ने ‘आईना-ए-ग़ज़ल’ को पुणे की यादगार साहित्यिक-सांस्कृतिक शाम बना दिया। अमित वाईकर ने भी कुछ नगमे पेश किए. मिलिंद कुलकर्णी ने सूत्र संचालन किया.



