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थायरॉयड सेहत: बेहतर मेटाबॉलिज़्म की ओर पहला कदम

थायरॉयड सेहत: बेहतर मेटाबॉलिज़्म की ओर पहला कदम

विशाल समाचार संवाददाता 

थायरॉयड ग्रंथि भले ही छोटी हो, लेकिन यह शरीर के लिए बेहद ज़रूरी काम करती है। यह मेटाबॉलिज़्म को नियंत्रित करती है, जिससे वजन, ऊर्जा, दिल की धड़कन और ब्लड शुगर संतुलित रहते हैं। जब थायरॉयड ठीक से काम नहीं करता, तो इसका असर पूरे शरीर पर दिखाई देने लगता है। विशेषज्ञों के अनुसार, मेटाबॉलिक सिंड्रोम से पीड़ित हर चार में से एक व्यक्ति को हाइपोथायरॉयडिज़्म हो सकता है । विश्व थायरॉयड जागरूकता माह के मौके पर यह समझना ज़रूरी है कि थायरॉयड और मेटाबॉलिक सिंड्रोम के बीच क्या संबंध है और समय रहते जांच क्यों आवश्यक है।

 

 

डॉ. वैशाली देशमुख, कंसल्टेंट एंडोक्रिनोलॉजिस्ट, दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल, पुणे के अनुसार, “हाइपोथायरॉयडिज़्म तब होता है जब थायरॉयड ग्रंथि शरीर की ज़रूरत के मुताबिक हार्मोन नहीं बना पाती। इससे शरीर की गति धीमी पड़ जाती है और मेटाबॉलिज़्म प्रभावित होता है। इसका असर वजन, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल और हृदय स्वास्थ्य पर पड़ता है। कम थायरॉयड फ़ंक्शन एलडीएल कोलेस्ट्रॉल बढ़ा सकता है, इंसुलिन रेज़िस्टेंस पैदा कर सकता है और डायबिटीज़ का खतरा बढ़ा देता है।”

 

और एबॉट इंडिया की मेडिकल अफेयर्स हेड डॉ. किन्नेरा पुटरेवु ने कहा, “हाइपोथायरॉयडिज़्म शुरुआती चरण में अक्सर पहचान में नहीं आता, क्योंकि इसके लक्षण मेटाबॉलिक सिंड्रोम से मिलते-जुलते होते हैं। ऐसे में जिन लोगों में मेटाबॉलिक सिंड्रोम या उससे जुड़े जोखिम कारक हैं, उनके लिए नियमित थायरॉयड जांच की सलाह दी जाती है। यदि आप इस श्रेणी में आते हैं, तो डॉक्टर से नियमित जांच कराना बेहद ज़रूरी है।”

 

मेटाबॉलिक सिंड्रोम क्या है

दुनियाभर में हर चार में से एक व्यक्ति मेटाबॉलिक सिंड्रोम से प्रभावित है। मेटाबॉलिक सिंड्रोम कोई एक बीमारी नहीं, बल्कि कई स्वास्थ्य समस्याओं का समूह है, जो अक्सर एक साथ दिखाई देती हैं—जैसे उच्च रक्तचाप, बढ़ा हुआ ब्लड शुगर और पेट के आसपास अधिक चर्बी। जब ये समस्याएं एक साथ होती हैं, तो दिल की बीमारी, स्ट्रोक और टाइप-2 डायबिटीज़ का खतरा काफी बढ़ जाता है। किसी व्यक्ति में यदि तीन या उससे अधिक जोखिम कारक मौजूद हों—जैसे हाई ब्लड शुगर, गुड एचडीएल कोलेस्ट्रॉल का निम्‍न स्‍तर, बढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड्स, बढ़ी हुई कमर की माप और हाई ब्लड प्रेशर—तो उसे मेटाबॉलिक सिंड्रोम माना जाता है। लंबे समय में ये सभी कारण मिलकर हृदय रोग, मधुमेह, स्ट्रोक और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ा देते हैं।

 

हाइपोथायरॉयडिज़्म और मेटाबॉलिक सिंड्रोम अक्सर एक साथ पाए जाते हैं और शरीर में ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल, वजन और ब्लड प्रेशर के संतुलन को प्रभावित करते हैं। यह संबंध भारत में और भी अहम हो जाता है, क्योंकि यहां करीब हर 10 में से 1 व्यक्ति हाइपोथायरॉयडिज़्म से प्रभावित है। आज की तेज़ रफ्तार जीवनशैली—गलत और असंतुलित खानपान, शारीरिक गतिविधि की कमी, लगातार तनाव, अनियमित नींद और पर्यावरणीय कारण—इन दोनों समस्याओं को बढ़ावा देने वाला खतरनाक संयोजन बन जाती है।.

 

थायरॉयड को संतुलन में रखने के आसान तरीके  आहार: बेहतर सेहत की पहली सीढ़ी

थायरॉयड को स्वस्थ रखने के लिए पोषक तत्वों का सही संतुलन बेहद ज़रूरी है। किसी भी पोषक तत्व की कमी या अधिकता, दोनों ही थायरॉयड के कामकाज को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए संतुलित आहार अपनाएं और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, ज़्यादा संतृप्त वसा, अधिक सोया युक्त उत्पादों और अतिरिक्त चीनी का सेवन कम करें।

 

दवाओं में लापरवाही न करें

थायरॉयड की दवाएं डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित रूप से लेना बहुत ज़रूरी है। इससे हार्मोन का संतुलन बना रहता है और इलाज प्रभावी होता है। बिना डॉक्टर से परामर्श किए दवा बंद करना या उसकी मात्रा बदलना नुकसानदेह हो सकता है।

 

रोज़ थोड़ा सक्रिय रहें

तेज़ चलना, साइक्लिंग या तैराकी जैसे हल्के व्यायाम को अपनी दिनचर्या में शामिल करें। नियमित शारीरिक गतिविधि मेटाबॉलिज़्म को सक्रिय रखती है और वजन बढ़ने जैसे हाइपोथायरॉयडिज़्म के लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद करती है।

 

शांत रहें, स्‍वस्‍थ रहें

तनाव सिर्फ मन को ही नहीं, बल्कि थायरॉयड को भी प्रभावित करता है। लगातार तनाव से शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ जाता है, जो थायरॉयड के सामान्य कार्य में बाधा डाल सकता है। ध्यान, योग, गहरी सांस लेने की तकनीक और खुद के लिए समय निकालकर तनाव को नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे हार्मोन संतुलन बना रहता है और थायरॉयड सेहत बेहतर होती है।

 

मेटाबॉलिक सिंड्रोम और हाइपोथायरॉयडिज़्म अक्सर साथ-साथ पाए जाते हैं और एक-दूसरे के प्रभाव को और बढ़ा देते हैं। ऐसे में जागरूकता बढ़ाना, समय-समय पर जांच कराना और समग्र इलाज अपनाना बेहद ज़रूरी है। सही देखभाल और जीवनशैली में बदलाव के साथ थायरॉयड को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है और समग्र स्वास्थ्य को सुरक्षित रखा जा सकता है।

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