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बेटी की तलाक के बाद रिटायर्ड जज ने बजवाया ढोल-नगाड़े, बिना किसी एलिमनी हुई ‘घर वापसी’

बेटी की तलाक के बाद रिटायर्ड जज ने बजवाया ढोल-नगाड़े, बिना किसी एलिमनी हुई ‘घर वापसी’

मेरठ के शास्त्रीनगर निवासी रिटायर्ड जज डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा ने तलाक के बाद अपनी बेटी प्रणिता वशिष्ठ का ढोल-नगाड़ों के साथ स्वागत कर समाज को नई सोच दी।

रिपोर्ट :विशाल समाचार

स्थान:मेरठ उत्तर प्रदेश

 

मेरठ: शास्त्रीनगर निवासी उत्तराखंड कैडर के रिटायर्ड जिला जज डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा ने समाज के सामने एक अनोखी मिसाल पेश की है। अपनी बेटी प्रणिता वशिष्ठ के तलाक की कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्होंने उसे कोर्ट से घर लाने का फैसला लिया। लेकिन उन्होंने इसे साधारण तरीके से नहीं किया। उन्होंने बेटी की घर वापसी को पूरे सम्मान और खुशी के साथ मनाया।

 

ढोल-नगाड़ों के साथ स्वागत

कोर्ट से घर तक का पूरा रास्ता ढोल-नगाड़ों और गाजे-बाजे से गूंज उठा। नाच-गाना हुआ और बेटी प्रणिता को फूलों की मालाएं पहनाई गईं। डॉ. शर्मा ने इस पूरे कार्यक्रम को अपनी बेटी के स्वाभिमान का उत्सव बना दिया। उन्होंने कहा कि बेटी का सम्मान ससुराल में प्रताड़ना सहकर रहने में नहीं है। असली सम्मान तो सिर ऊंचा करके अपने घर वापस आने में है।

डॉ. शर्मा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मैंने कोई एलिमनी या पैसे नहीं मांगे। मैं सिर्फ अपनी बेटी को वापस लाया हूं। मेरी बेटी कोई सामान नहीं है कि उसे कहीं भी छोड़ दिया जाए। उसका सम्मान सबसे पहले और सबसे ऊपर है।

मेरी बेटी खुद सक्षम

प्रणिता वशिष्ठ मनोविज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएट हैं। वह वर्तमान में तेजगढ़ी चौराहे पर स्थित प्रणव वशिष्ठ जुडिशल अकादमी में फाइनेंस डायरेक्टर के पद पर काम कर रही हैं। वे अपने माता-पिता की इकलौती संतान हैं। वर्ष 2022 में उनके भाई, सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता प्रणव वशिष्ठ का चंडीगढ़ में एक दुर्घटना में सिर में गंभीर चोट लगने से निधन हो गया था। भाई की याद में ही इस जुडिशल अकादमी की स्थापना की गई। यह अकादमी शहर के जरूरतमंद लोगों को शिक्षा और न्याय के क्षेत्र में मदद पहुंचाने का केंद्र बनी हुई है।

 

समाज के लिए नई प्रेरणा

डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा के इस साहसिक कदम की शहर के विभिन्न सामाजिक संगठनों ने खूब सराहना की है। पूरे शहर में इसकी चर्चा हो रही है। लोग कह रहे हैं कि नारी सशक्तिकरण सिर्फ भाषणों और नारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह ऐसे ठोस और साहसिक कदमों से ही साकार होता है। कई सारे लोगों का कहना है कि डॉ. शर्मा की इस पहल ने उन माता-पिता को नई राह दिखाई है जो सामाजिक डर और लोक-लाज के कारण अपनी बेटियों को दुख भरे जीवन में धकेल देते हैं। उन्होंने यह संदेश दिया है कि बेटी की खुशी और सम्मान किसी भी सामाजिक दबाव से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

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