
मनःशांति और विश्वशांति के लिए भारतीय योग व सूर्यनमस्कार मार्गदर्शक
पोलैंड के विशेषज्ञ डॉ. क्रिस्टोफ स्टेक के विचार
विश्वधर्मी प्रा. डॉ. विश्वनाथ कराड के निवास पर हुआ हृदयस्पर्शी संवाद
रिपोर्ट:विशाल समाचार
स्थान:पुणे, महाराष्ट्र
सूर्यनमस्कार के माध्यम से शारीरिक स्वास्थ्य, योग चिकित्सा, मानसिक संतुलन और अंततः सामाजिक स्वास्थ्य प्राप्त करना आज के वैश्विक अशांति के दौर में अत्यंत आवश्यक है। यह विचार वारसा (पोलैंड) के शारीरिक शिक्षा के विशेषज्ञ प्राध्यापक डॉ. क्रिस्टोफ स्टेक ने व्यक्त किए।
भारत दौरे पर आए डॉ. स्टेक, प्रसिद्ध शिक्षाविद् विश्वधर्मी प्रा. डॉ. विश्वनाथ दा. कराड के विश्वशांति के क्षेत्र में किए गए कार्यों से प्रभावित होकर उनसे मिलने कोथरुड स्थित उनके निवास पर पहुंचे। इस अवसर पर एक स्नेह मिलन कार्यक्रम आयोजित किया गया।
कार्यक्रम में डॉ. स्टेक का सम्मान शाल ओढ़ाकर तथा विश्व के सबसे बड़े विश्वशांति गुंबद की प्रतिकृति भेंट कर किया गया।
अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. स्टेक ने कहा कि भारतीय संस्कृति केवल एक जीवनशैली नहीं, बल्कि जीवन का संपूर्ण दर्शन है। विभिन्न धर्मों, कला, संगीत, संस्कार और परंपराओं का संगम होने के कारण भारतीय संस्कृति न केवल भारत, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए आदर्श है। इसकी सुंदरता, विचारधारा और संस्कार मानव जीवन का आधार बनते हैं। विविधता, अध्यात्म और “वसुधैव कुटुम्बकम” के सिद्धांत पर आधारित यह संस्कृति योग और आयुर्वेद के माध्यम से मानव विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है तथा मानवता का संदेश देती है।
प्रा. डॉ. विश्वनाथ दा. कराड ने अपने विचार रखते हुए कहा कि वर्तमान युद्ध जैसी परिस्थितियों में, जब विश्व तीसरे विश्वयुद्ध के कगार पर खड़ा प्रतीत होता है, ऐसे समय में युद्धविराम की घोषणा कर दुनिया को बड़े संकट से बचाने के प्रयास सराहनीय हैं। उन्होंने विश्व में शांति और सद्भाव का संदेश फैलाने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही, उन्होंने कहा कि “विश्वगुरु भारत” की आत्मबोध कराने वाली यह परंपरा निरंतर जारी रहनी चाहिए।

एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार डॉ. रत्नदीप जोशी ने बताया कि डॉ. स्टेक ने पोलैंड की यान यूनिवर्सिटी से शारीरिक शिक्षा में पीएचडी की है। वे पिछले 50 वर्षों से भारत आते रहे हैं और कैवल्यधाम योग संस्थान तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं में संस्कृत और योग पर शोध कर चुके हैं। यूरोप सहित विभिन्न महाद्वीपों में उनके द्वारा किया जा रहा कार्य भारतीय संस्कृति की वैश्विक महत्ता को दर्शाता है।
इस अवसर पर प्रा. डॉ. कराड के प्रेरणादायी जीवन पर आधारित डॉ. संजय उपाध्ये द्वारा रचित गीतों का संगीतमय प्रस्तुतीकरण प्रा. शशांक दिवेकर ने किया। इन गीतों को उन्होंने मधुर धुनों में पिरोया। यह कार्यक्रम पाश्चात्य और पूर्वीय संस्कृतियों के बीच संबंधों को मजबूत करने और “वसुधैव कुटुम्बकम” के संदेश को पुनः स्मरण कराने वाला रहा, जिसे उपस्थित सभी अतिथियों ने सराहा।
इस ज्ञान-संवाद कार्यक्रम में सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक और चिकित्सा क्षेत्र के अनेक वरिष्ठ गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति रही।



