
लोककलाकारों को मिले सरकारी संरक्षण, तभी बचेगी लोककला: समरसता लोककला सम्मेलन में उठी मांग
रिपोर्ट: विशाल समाचार
स्थान:पुणे महाराष्ट्र
पुणे। महाराष्ट्र की पारंपरिक लोककलाओं के संरक्षण और लोककलाकारों की समस्याओं को लेकर पुणे के बालगंधर्व रंगमंदिर में आयोजित प्रथम समरसता लोककला सम्मेलन में वरिष्ठ लोककलाकारों ने सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग की। वक्ताओं ने कहा कि लावणी, तमाशा, गवळण, भारुड और पोवाड़ा जैसी लोककलाओं ने सदियों से महाराष्ट्र की संस्कृति को समृद्ध किया है, लेकिन इन्हें जीवंत रखने वाले कलाकार आज भी आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। उनका कहना था कि यदि लोककलाकार सुरक्षित और सशक्त रहेंगे, तभी लोककलाओं का वास्तविक संरक्षण संभव होगा।
महाराष्ट्र राज्य सांस्कृतिक संचालनालय और समरसता साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस सम्मेलन में वरिष्ठ नृत्यांगना मंगला बनसोडे, सुरेखा पुणेकर, वरिष्ठ गायक नंदेश उमप, जयमाला इनामदार तथा पुणे विश्वविद्यालय के ललित कला केंद्र के प्रमुख प्रवीण भोळे सहित अनेक कलाकारों ने अपने विचार रखे। इस अवसर पर प्रसन्न पाटील, धनंजय खुडे, निलेश गद्रे सहित अन्य गणमान्य उपस्थित रहे।
वरिष्ठ लोककलाकार रघुवीर खेडकर ने कहा कि लगभग 50 वर्ष पहले अत्यंत कठिन परिस्थितियों में लोककलाओं को जीवित रखा गया, लेकिन आज पूरे महाराष्ट्र में तमाशा के फड़ों की संख्या सैकड़ों से घटकर केवल 10 से 12 रह गई है। उन्होंने कहा कि लोककला का अस्तित्व कलाकारों पर निर्भर है और यदि कलाकार आर्थिक संकट से जूझते रहेंगे तो इस विरासत को आगे बढ़ाना कठिन होगा। मंगला बनसोडे ने अपने लंबे कलात्मक सफर का श्रेय दर्शकों के प्रेम और समर्थन को देते हुए कहा कि वह जीवनभर उनके प्रति कृतज्ञ रहेंगी। वहीं सुरेखा पुणेकर ने सम्मेलन में सरकारी प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति पर नाराजगी जताते हुए इसे लोककलाकारों का अपमान बताया और कहा कि कलाकारों की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार और कलाकारों के बीच संवाद आवश्यक है। नंदेश उमप ने कलाकारों से एकजुट होकर अपनी मांगें सरकार के समक्ष रखने का आह्वान किया, जबकि प्रवीण भोळे ने कहा कि डिजिटल युग में भी लोककलाकार महाराष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखे हुए हैं। उन्होंने सरकार से कलाकारों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए प्रभावी योजनाएं लागू करने और उन्हें पुनः सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराने की अपील की। सम्मेलन का संचालन जितेंद्र वाईकर ने किया।


