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भारत में टाइप 2 मधुमेह से पीड़ित पुरुषों में लैंगिक दुर्बलता का प्रमाण अधिक, नए अध्ययन में खुलासा

भारत में टाइप 2 मधुमेह से पीड़ित पुरुषों में लैंगिक दुर्बलता का प्रमाण अधिक, नए अध्ययन में खुलासा

रिपोर्ट: विशाल समाचार 

स्थान:पुणे महाराष्ट्र 

पुणे,  : पुणे स्थित फ्रीडम फ्रॉम डायबिटीज क्लिनिक के संशोधकों द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि टाइप 2 मधुमेह से पीड़ित लगभग दो-तिहाई पुरुष इरेक्टाइल डिसफंक्शन (ईडी) यानी लैंगिक दुर्बलता से प्रभावित हैं.अध्ययन में इस बात पर जोर दिया गया है कि मधुमेह के उपचार में केवल रक्त शर्करा नियंत्रण ही नहीं, बल्कि लैंगिक और मानसिक स्वास्थ्य की नियमित जांच भी आवश्यक है.

 

‌‘प्रीवेलन्स ॲन्ड रिस्क फॅक्टर्स ऑफ इरेक्टाइल डिसफंक्शन इन मेन विथ टाईप 2 डायबिटीज इन रिअल-वर्ल्ड क्लिनिकल प्रॅक्टिस‌‘ शीर्षक वाला यह संशोधन अभ्यास 5 से 8 जून 2026 दौरान अमेरिका के न्यू ऑर्लिन्स में आयोजित अमेरिकन डायबिटीज असोसिएशन (एडीए) के 86वें वैज्ञानिक सत्र में प्रस्तुत किया गया. इस संशोधन का सारांश एडीए की अधिकृत डायबेटिस इस नियतकालिक में भी प्रकाशित हुआ है.

 

इस अध्ययन में फ्रीडम फ्रॉम डायबेटीस क्लिनिक में उपचार ले रहे 25 वर्ष और उससे अधिक आयु के 473 पुरुषों को शामिल किया गया. पूर्व के कई अध्ययनों में अन्य सहव्याधीवाले मरीजों को शामिल नहीं किया गया था, जबकि इस अध्ययन में नियमित रूप से उपचार प्राप्त कर रहे मरीजों को शामिल किया गया. इससे टाइप 2 मधुमेह की वास्तववादी परिस्थिती की अधिक जानकारी प्राप्त हुई.

 

यह अध्ययन डॉ. प्रमोद त्रिपाठी, डॉ. ए. व्यवहारे, डॉ. एन. एस. कदम, डॉ. बी. शर्मा, डॉ. डी. तिवारी, डॉ. टी. आर. काथ्रीकोल्ली, डॉ. एम. गानला और डॉ. बंशी साबू द्वारा किया गया.

 

अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार, 64 प्रतिशत सहभागी पुरुषों में सौम्य से लेकर गंभीर स्तर तक का इरेक्टाइल डिसफंक्शन पाया गया. 35.9 प्रतिशत पुरुषों में कोई लक्षण नहीं थे, जबकि लगभग एक-तिहाई पुरुषों में सौम्य स्तर का इरेक्टाइल डिसफंक्शन पाया गया. वहीं, लगभग 32 प्रतिशत पुरुषों में मध्यम से गंभीर स्तर की समस्या देखी गई.

 

इस अध्ययन में शामिल मरीजों में अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी काफी प्रमाण में पाई गईं. 43 प्रतिशत मरीज उच्च रक्तचाप, 46 प्रतिशत डिस्लिपिडेमिया, 38 प्रतिशत दीर्घकालिक किडनी की बीमारी , 8 प्रतिशत न्यूरोपैथी से प्रभावित थे. मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी व्यापक रूप से देखी गईं. लगभग आधे प्रतिभागियों में डिप्रेशन के लक्षण पाए गए, जबकि 40 प्रतिशत से अधिक प्रतिभागियों में एंग्जाइटी के लक्षण मौजूद थे.

 

बहुविविध विश्लेषण के माध्यम से शोधकर्ताओं ने इरेक्टाइल डिसफंक्शन के तीन स्वतंत्र जोखिम कारकों की पहचान की. इनमें बढ़ती आयु, डिप्रेशन तथा इंसुलिन और मुंह से ली जाने वाली ओरल डायबिटीज दवाओं का संयुक्त उपचार शामिल था. अध्ययन में पाया गया कि डिप्रेशन से ग्रस्त पुरुषों में इरेक्टाइल डिसफंक्शन की संभावना दोगुने से भी अधिक थी. इसी प्रकार, इंसुलिन और ओरल हाइपोग्लाइसेमिक दवाओं का एकत्रित उपचार लेने वाले मरीजों में भी इरेक्टाइल डिसफंक्शन का धोखा लक्षणीय रूप से अधिक पाया गया.

 

शोधकर्ताओं के अनुसार, इरेक्टाइल डिसफंक्शन केवल जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाली समस्या नहीं है, बल्कि यह टाइप 2 मधुमेह से पीड़ित व्यक्तियों में चयापचय और मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति का एक महत्वपूर्ण सूचक भी हो सकता है.

 

इस शोध से यह स्पष्ट हुआ है कि मधुमेह व्यवस्थापन कार्यक्रमों में इरेक्टाइल डिसफंक्शन और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की नियमित जांच को शामिल किया जाना चाहिए. इन समस्याओं की समय पर पहचान और उचित उपचार से मरीजों के समग्र स्वास्थ्य, उपचार के प्रति निरंतरता तथा दीर्घकालिक स्वास्थ्य परिणामों में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है.

 

शोधकर्ताओं का मानना है कि रक्त शर्करा नियंत्रण, मानसिक स्वास्थ्य और लैंगिक स्वास्थ्य इन तीनों पहलुओं को समान महत्व देते हुए मधुमेह व्यवस्थापन का समग्र दृष्टिकोण अपनाया जाए, तो मरीजों की देखभाल की गुणवत्ता और उनके जीवन स्तर में महत्वपूर्ण सुधार संभव है.

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