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दलित कला और साहित्य आंदोलन को और मजबूत करने की जरूरत : डॉ. सुखदेव थोरात

दलित कला और साहित्य आंदोलन को और मजबूत करने की जरूरत : डॉ. सुखदेव थोरात

उर्गेंन आर्ट फेस्टिवल’ का उत्साहपूर्वक उद्घाटन

रिपोर्ट विशाल समाचार 

स्थान पुणे महाराष्ट्र 

पुणे। विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था और धार्मिकता का प्रचार करने वाली कला एवं साहित्य समाज में विभाजन पैदा कर सकते हैं। पुणे की पहचान अभिजात कला के लिए है, लेकिन उसमें समानता का विचार अपेक्षित रूप से सामने नहीं आता। समाज में एकता और बंधुत्व स्थापित करने के लिए समानता का संदेश देने वाले दलित साहित्य और कला की आज बेहद आवश्यकता है। इसके लिए दलित कला और साहित्य आंदोलन को और अधिक मजबूत किया जाना चाहिए। यह विचार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. सुखदेव थोरात ने व्यक्त किए।

 

करुणादीप फाउंडेशन और त्रिरत्न वैरोचना सेंटर की ओर से बालगंधर्व रंगमंदिर में आयोजित ‘उर्गेंन आर्ट फेस्टिवल’ का उद्घाटन डॉ. सुखदेव थोरात की प्रमुख उपस्थिति में हुआ। इस अवसर पर वरिष्ठ चित्रकार सवींद्र सावरकर, विचारक राजू परुळेकर, करुणादीप फाउंडेशन के प्रमुख डॉ. जीवक वी. डी. गायकवाड, डॉ. अस्मिता गायकवाड तथा पूर्व पुलिस महानिदेशक चंद्रशेखर दैठणकर सहित अन्य गणमान्य उपस्थित रहे।

 

डॉ. थोरात ने कहा कि नाटक, सिनेमा और विभिन्न परफॉर्मिंग आर्ट्स समाज का प्रबोधन करते हुए समानता और विचारों की भाषा बोलते हैं। इनके माध्यम से सामाजिक परिवर्तन भी संभव है। समाज में ब्राह्मणवादी विचारों के स्थान पर समाजवादी और समतावादी विचारों की स्थापना होना परिवर्तन की शुरुआत है। इस परिवर्तन की मुहिम को और मजबूती देने के लिए साहित्य और कला के माध्यम से दलित समाज के दुख-दर्द को सामने लाना जरूरी है।

 

राजू परुळेकर ने कहा कि बौद्ध धर्म ने हमेशा समता और समानता का विचार दिया है। भारत में बौद्ध धर्म प्राचीन काल से मौजूद रहा है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने बौद्ध धर्म की दीक्षा लेकर उसे नया जीवन दिया। भारत में बौद्ध धर्म का जिस स्तर पर प्रचार-प्रसार होना चाहिए था, वह नहीं हो सका, यह चिंता का विषय है। समानता का संदेश देने वाले बौद्ध विचारों की आज समाज को आवश्यकता है और कला एवं साहित्य के माध्यम से यह विचार लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए।

 

सवींद्र सावरकर ने कहा कि एक कलाकार के रूप में किसी के प्रभाव में नहीं आना चाहिए। मेरे गुरु ने मुझे यही सीख दी और पिछले 40 वर्षों से मैं इसी विचार के आधार पर अपनी कला यात्रा आगे बढ़ा रहा हूं। बौद्ध धर्म और विज्ञान को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। इसी विचार को अपनी कला के माध्यम से समाज तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा हूं।

 

डॉ. जीवक गायकवाड ने कहा कि इस महोत्सव के माध्यम से बौद्ध धर्म की शिक्षाओं और विचारों का प्रचार-प्रसार किया जा सकता है। वर्तमान समय में इन विचारों की समाज को बेहद आवश्यकता है। कला और साहित्य के माध्यम से बौद्ध विचारों को विशेष रूप से युवाओं तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

 

बालगंधर्व रंगमंदिर में ‘उर्गेंन आर्ट फेस्टिवल’ 3 सितंबर तक सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक आयोजित किया जा रहा है। महोत्सव में सभी के लिए प्रवेश निःशुल्क है।

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