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तंजावुर में मराठी-तमिल संस्कृति के सेतु को मजबूत करने का आह्वान

तंजावुर में मराठी-तमिल संस्कृति के सेतु को मजबूत करने का आह्वान

रिपोर्ट विशाल समाचार 

स्थान देश

तंजावुर, । अखिल भारतीय मराठी साहित्य परिषद की ओर से आयोजित सरफोजीराजे द्वितीय मराठी साहित्य सम्मेलन का आयोजन 23 सितंबर 2026 को तंजावुर, तमिलनाडु में किया जाएगा। सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. शरद गोरे अपने अध्यक्षीय भाषण में मराठी-तमिल सांस्कृतिक संबंधों, राजा सरफोजीराजे द्वितीय के बहुआयामी योगदान और उनके ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डालेंगे।

 

डॉ. गोरे के अनुसार, तंजावुर केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि मराठी और तमिल संस्कृति के ऐतिहासिक संगम की भूमि है। छत्रपति शिवाजी महाराज के भाई व्यंकोजीराजे भोसले के माध्यम से मराठों का तंजावुर से संबंध स्थापित हुआ। इसके बाद मराठा शासनकाल में स्थानीय कला, साहित्य, संगीत और संस्कृति के संरक्षण एवं विकास को महत्वपूर्ण प्रोत्साहन मिला।

 

ज्ञान, कला और विज्ञान के संरक्षक थे सरफोजीराजे

 

राजा सरफोजीराजे द्वितीय को डॉ. गोरे ने ज्ञान, विज्ञान, कला, साहित्य, संगीत, शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में योगदान देने वाले बहुआयामी शासक के रूप में रेखांकित किया है।

 

तंजावुर चित्रशैली को मिला संरक्षण, संगीत के क्षेत्र में किए गए प्रयोग, भरतनाट्यम के विकास में योगदान तथा सरस्वती महाल पुस्तकालय और धन्वंतरी महाल जैसी संस्थाओं के विकास को सरफोजीराजे की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल किया गया है।

 

सरफोजीराजे ने विभिन्न भाषाओं के ग्रंथों, दुर्लभ पांडुलिपियों, ताड़पत्रों, मानचित्रों तथा चिकित्सा संबंधी साहित्य को संरक्षित करने की दिशा में भी कार्य किया। उनके बहुभाषी साहित्यिक और ज्ञान संबंधी योगदान का आधुनिक शोध के माध्यम से व्यापक अध्ययन किए जाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।

 

विरासत के संरक्षण के लिए चार प्रमुख सुझाव

 

डॉ. शरद गोरे ने सरफोजीराजे की विरासत को संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार तथा महाराष्ट्र और तमिलनाडु सरकार के समक्ष चार प्रमुख सुझाव रखे हैं।

 

1. सरस्वती महाल पुस्तकालय का व्यापक डिजिटलीकरण

मोडी लिपि सहित संस्कृत और तमिल भाषाओं की दुर्लभ पांडुलिपियों एवं ताड़पत्रों का आधुनिक तकनीक के माध्यम से डिजिटलीकरण किया जाए और उन्हें शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध कराया जाए।

 

2. तंजावुर में मराठी-तमिल भाषा एवं संस्कृति अनुसंधान केंद्र की स्थापना

मराठी और तमिल साहित्य के परस्पर अनुवाद, शोध तथा दोनों भाषाओं के बीच सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देने के लिए तंजावुर में विशेष अनुसंधान केंद्र स्थापित किया जाए।

 

3. धन्वंतरी महाल के चिकित्सा साहित्य पर आधुनिक शोध

सरफोजीराजे द्वारा संकलित चिकित्सा संबंधी ग्रंथों और सामग्री पर आधुनिक वैज्ञानिक एवं शोध परियोजनाएं शुरू की जाएं, ताकि ऐतिहासिक चिकित्सा ज्ञान का अध्ययन किया जा सके।

 

4. शैक्षणिक पाठ्यक्रम में सरफोजीराजे के योगदान को शामिल करना

महाराष्ट्र और तमिलनाडु के स्कूल एवं विश्वविद्यालय स्तर के पाठ्यक्रमों में सरफोजीराजे के योगदान और मराठी-तमिल सांस्कृतिक संबंधों पर विशेष पाठ शामिल किया जाए।

 

भाषा नहीं, संस्कृति को जोड़ने वाला सेतु

 

डॉ. शरद गोरे ने कहा कि भाषा दीवारें खड़ी करने के लिए नहीं, बल्कि विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ने के लिए होती है। सरफोजीराजे ने लगभग दो शताब्दी पहले मराठी और तमिल संस्कृति के बीच जो सांस्कृतिक सेतु बनाया, उसे मजबूत करना वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी है।

 

उन्होंने मराठी भाषा के प्रति गौरव के साथ-साथ देश की सभी भारतीय भाषाओं के सम्मान का आह्वान किया। साथ ही मराठी भाषा और साहित्य के ज्ञान को देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

 

“सरफोजीराजे की स्मृति को कोटि-कोटि नमन। जय मायमराठी, जय हिंद!”

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