बयान नहीं, सुरक्षा चाहिएं !
जमुई की घटना ने कानून-व्यवस्था पर फिर खड़े किए गंभीर सवाल
संपादकीय
बिहार में कानून-व्यवस्था को लेकर समय-समय पर बड़े-बड़े दावे और सख्त बयान सामने आते रहे हैं। 29 सितंबर 2025 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का भी एक बयान चर्चा में रहा था, जिसमें उन्होंने रात में गांव लौटने और सुरक्षा को लेकर कड़ा संदेश दिया था। आज जमुई की घटना के बाद वही सवाल फिर सामने है—सरकार के दावों और जमीन पर आम नागरिक की सुरक्षा के बीच कितनी दूरी है?
जमुई में नाबालिग छात्र-छात्रा के साथ कथित अभद्रता और छेड़छाड़ का वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की। मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित किया गया और पुलिस के अनुसार तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। अन्य आरोपियों की तलाश जारी है। घटना 19 सितंबर की बताई जा रही है।
पुलिस की कार्रवाई हुई, यह स्वागत योग्य है। लेकिन इसके साथ कुछ सवालों का उठना भी स्वाभाविक है। यदि घटना सार्वजनिक स्थान पर हुई, तो उस समय वहां सुरक्षा व्यवस्था कैसी थी? पुलिस को घटना की जानकारी कब हुई? कार्रवाई शुरू होने में कितना समय लगा? और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रशासन की क्या योजना है?
खबर सामने आने पर ही क्यों जागता है तंत्र?
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण पक्ष मीडिया की भूमिका का है। किसी घटना की रिपोर्टिंग और नाबालिग पीड़ित की पहचान अथवा आपत्तिजनक वीडियो का प्रसारण—दोनों को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता।
नाबालिगों की पहचान और निजता की रक्षा सर्वोपरि है। ऐसे वीडियो को प्रसारित करना उचित नहीं है। पुलिस द्वारा वीडियो हटाने और उसे प्रसारित करने वाले सोशल मीडिया खातों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, तो यह कानून के मुताबिक होना चाहिए।
लेकिन घटना की तथ्यात्मक खबर करना, प्रशासन से सवाल पूछना और जनता तक सूचना पहुंचाना मीडिया की जिम्मेदारी भी है। अगर किसी घटना की खबर सामने आने के बाद पुलिस सक्रिय होती है, तो सवाल खबर पर नहीं, उस व्यवस्था पर होना चाहिए जो घटना को पहले ही रोक नहीं सकी।
लोकतंत्र में मीडिया से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह केवल सरकारी कार्रवाई की सूचना दे। उसका दायित्व यह पूछना भी है कि घटना क्यों हुई, सुरक्षा व्यवस्था कहां थी और जिम्मेदारी किसकी बनती है।
‘जंगलराज’ की राजनीति से आगे बढ़ना होगा
बिहार की राजनीति में ‘जंगलराज’ जैसे शब्द लंबे समय से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं। लेकिन जनता के लिए असली सवाल किसी पुराने शासन की तुलना नहीं, बल्कि आज की सुरक्षा व्यवस्था है।
सरकार किसी भी दल की हो, आम नागरिक की सुरक्षा उसकी जिम्मेदारी है। पिछली सरकार की कमियां वर्तमान व्यवस्था की कमियों का बचाव नहीं बन सकतीं और वर्तमान सरकार की उपलब्धियां उसे जवाबदेही से मुक्त नहीं कर सकतीं।
कार्रवाई निष्पक्ष हो, देरी पर भी सवाल हो
जमुई मामले में गिरफ्तारी और SIT जांच आगे की कार्रवाई का हिस्सा हैं। अब जरूरी है कि जांच निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से पूरी हो। जो लोग कानून के अनुसार दोषी पाए जाएं, उनके खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया के तहत कठोर कार्रवाई हो।
साथ ही, यदि जांच में किसी स्तर पर पुलिस या प्रशासन की लापरवाही सामने आती है तो उसकी भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। कानून आम नागरिक और सरकारी तंत्र—दोनों के लिए समान होना चाहिए।
पुलिस को भीड़ के दबाव में कार्रवाई नहीं करनी चाहिए और न ही किसी आरोपी के साथ मनमानी होनी चाहिए। गिरफ्तारी कानून के अनुसार हो, जांच साक्ष्यों के आधार पर हो और अंतिम फैसला न्यायालय करे।
जनता को बयान नहीं, भरोसा चाहिए
कानून-व्यवस्था का अर्थ केवल घटना के बाद गिरफ्तारी करना नहीं है। असली सफलता तब होगी जब सार्वजनिक स्थानों पर ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पुलिस की मौजूदगी, गश्त और त्वरित प्रतिक्रिया की व्यवस्था मजबूत हो।
मुख्यमंत्री का बयान हो या पुलिस की कार्रवाई—जनता को अंततः भाषण नहीं, सुरक्षा चाहिए। उसे यह भरोसा चाहिए कि सड़क पर कानून से बड़ा कोई नहीं है और किसी नागरिक के साथ ज्यादती होने पर पुलिस बिना दबाव और बिना भेदभाव के कार्रवाई करेगी।
जमुई की घटना बिहार के लिए केवल एक मामला नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था की परीक्षा है। इस परीक्षा का परिणाम बयानों से नहीं, निष्पक्ष जांच, जवाबदेही और जमीन पर दिखाई देने वाली सुरक्षा व्यवस्था से तय होगा।



