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भाषा विवाद का कारण नहीं, बल्कि संवाद का माध्यम है : डॉ. शरद गोरे

भाषा विवाद का कारण नहीं, बल्कि संवाद का माध्यम है : डॉ. शरद गोरे

तंजावर में सरफोजीराजे (द्वितीय) मराठी साहित्य सम्मेलन उत्साह के साथ संपन्न

रिपोर्ट विशाल समाचार 

स्थान पुणे महाराष्ट्र 

तंजावर,। भाषा मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाली सबसे प्रभावशाली शक्ति है। यह किसी समाज की स्मृतियों, संस्कृति, परंपराओं, इतिहास और भावनाओं को संजोने का जीवंत माध्यम है। इसलिए भाषा पर गर्व करना स्वाभाविक है, लेकिन यह गर्व दूसरी भाषा के प्रति तिरस्कार या वैरभाव में बदल जाए, तो यह भाषा का ही अपमान है। भाषा विवाद का कारण नहीं, बल्कि संवाद का माध्यम है। यह विचार अखिल भारतीय मराठी साहित्य परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं सरफोजीराजे (द्वितीय) मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. शरद गोरे ने व्यक्त किए।

 

तंजावर स्थित विश्वप्रसिद्ध बृहदेश्वर मंदिर परिसर के पेथनन कलैयारंगम सभागार में सरफोजीराजे मराठी साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया गया। डॉ. गोरे सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए संबोधित कर रहे थे।

 

सम्मेलन का उद्घाटन तंजावर संस्थान के प्रमुख श्रीमंत छत्रपति बाबाजीराजे भोसले के हाथों हुआ। इस अवसर पर सम्मेलन के निमंत्रक एवं तमिलनाडु प्रदेश अध्यक्ष युवराज संभाजीराजे भोसले, छत्रपति आबाजीराजे भोसले तथा महाराष्ट्र के पूर्व उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री और सम्मेलन के स्वागताध्यक्ष प्रा. डॉ. लक्ष्मणराव ढोबले उपस्थित रहे।

 

विशेष अतिथि के रूप में अखिल भारतीय मराठी साहित्य परिषद की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शुभांगीताई कालभोर, कर्नाटक प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र पाटील, उद्यमी आप्पासाहेब गुरव तथा कोल्हापुर विभागीय अध्यक्ष विकास भोसले सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

 

भाषा के आधार पर सामाजिक दूरी पर जताई चिंता

डॉ. शरद गोरे ने कहा कि आज देश में जाति, धर्म, पंथ और भाषा के आधार पर सामाजिक दूरी पैदा करने के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे समय में तंजावर की धरती पर आयोजित यह मराठी साहित्य सम्मेलन भाषा की व्यापक और सकारात्मक भूमिका का महत्वपूर्ण संदेश देता है।

 

मराठी और तमिल संस्कृति के संगम पर जोर

 

छत्रपति बाबाजीराजे भोसले ने कहा कि इस सम्मेलन के माध्यम से मराठी और तमिल संस्कृति के बीच संगम स्थापित करने का कार्य हो रहा है। लोगों को जोड़ने में साहित्यकारों की भूमिका महत्वपूर्ण है। इस सम्मेलन ने मराठी और तमिल संस्कृति के बीच संबंधों को मजबूत करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।

 

युवराज संभाजीराजे भोसले ने कहा कि तमिलनाडु में सभी लोग मराठी नहीं समझते और महाराष्ट्र में तमिल भाषा सभी को समझ में नहीं आती। इसके बावजूद यहां के लोग स्नेह और अपनत्व के साथ एक-दूसरे को समझते हैं। उन्होंने भविष्य में साहित्य के माध्यम से मराठी और तमिल की साझा सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करने का आह्वान किया।

 

मराठी-तमिल को बताया जुड़ी हुई बहनें

 

प्रा. डॉ. लक्ष्मणराव ढोबले ने छत्रपति सरफोजीराजे के तमिलनाडु में किए गए कार्यों का उल्लेख करते हुए मराठी और तमिल भाषाओं को जुड़ी हुई बहनें बताया।

 

उन्होंने कहा कि मराठी भाषा को अभिजात भाषा का दर्जा दिलाने के लिए प्रयास भले ही देर से हुए हों, लेकिन अब साहित्य के क्षेत्र में निरंतर कार्य करते हुए आगे बढ़ना आवश्यक है। छत्रपति शिवाजी महाराज सहित विभिन्न राजाओं और मावलों के राष्ट्रहित में किए गए कार्यों से प्रेरणा लेकर विभिन्न राज्यों की अच्छी परंपराओं को अपनाना चाहिए और व्यापक साहित्य सम्मेलनों का आयोजन करना चाहिए।

 

पुस्तकों का विमोचन और कवि सम्मेलन

 

सम्मेलन के दौरान विभिन्न लेखकों की पुस्तकों का विमोचन किया गया। इनमें प्रा. डॉ. लक्ष्मणराव ढोबले की पुस्तक ‘आरक्षणाचे अ. ब. क. ड.’, सूर्यकांत नामुगडे की ‘सावल्या’ तथा लेखक माणिक कदम की ‘पर्यावरणाची परिक्रमा’ शामिल हैं।

 

इसके अलावा डॉ. दीप्ति पाटील की अध्यक्षता में परिसंवाद तथा प्रसिद्ध कवि रमेश रेडेकर की अध्यक्षता में आमंत्रित कवियों का कवि सम्मेलन उत्साहपूर्वक संपन्न हुआ।

 

इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले महाराष्ट्र के कई गणमान्य व्यक्तियों को विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

 

सम्मेलन के माध्यम से महाराष्ट्र के बाहर मराठी साहित्य की समृद्ध परंपरा को पहुंचाने तथा विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक समुदायों को साहित्य के माध्यम से जोड़ने का संदेश दिया गया।

कार्यक्रम का संचालन विक्रम मालन आप्पासो शिंदे ने किया, जबकि अमोल कुंभार ने आभार व्यक्त किया।

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