
मराठी की अनिवार्यता से ज्यादा मराठी के प्रति भक्ति जरूरी: कवि रमेश रेडेकर
तंजावुर में मराठी कवि सम्मेलन में विभिन्न बोलियों की कविताओं का हुआ संगम, मराठी-तमिल संबंधों को मजबूत करने पर जोर
रिपोर्ट विशाल समाचार
स्थान पुणे महाराष्ट्र
तंजावुर,। मराठी एक समृद्ध मातृभाषा है। इसका उपयोग व्यवहार, शिक्षा और बोलचाल में होना चाहिए। लेकिन मराठी को अनिवार्य करने से ज्यादा जरूरी है उसके प्रति मन से भक्ति और प्रेम रखना। तभी अभिजात मराठी भाषा को संरक्षित किया जा सकेगा। इसके साथ ही आज दुनिया की प्रमुख भाषाओं का ज्ञान होना भी आवश्यक है। यह विचार प्रसिद्ध कवि रमेश रेडेकर ने व्यक्त किए।
वे पेथनन कलैयारंगम सभागार, तंजावुर में आयोजित सरफोजीराजे (द्वितीय) मराठी कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए बोल रहे थे।
कार्यक्रम में तंजावुर संस्थान के छत्रपति आबाजीराजे भोसले मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इस अवसर पर प्रसिद्ध कवि सूर्यकांत नामुगडे, किशोर टिळेकर, सुवर्णा वाघमारे और संगीता लंघे सहित अन्य आमंत्रित कवि भी मौजूद रहे।
कवि रमेश रेडेकर ने कहा कि सभी भाषाओं के कवियों को कविता के माध्यम से प्रभावी अभिव्यक्ति की परंपरा को जीवित रखना चाहिए। व्यवस्था से सवाल करने वाली कविता ही जीवंत होती है। आज असहिष्णु व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाले कवियों और उनकी कविताओं की आवश्यकता है।
छत्रपति आबाजीराजे भोसले ने कहा कि तंजावुर के लोगों को पहली बार मराठी की विभिन्न बोलियों की कविताएं सुनने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में ऐसे सम्मेलन आयोजित होते रहने चाहिए, ताकि मराठी और तमिल भाषाओं के बीच सांस्कृतिक संबंध और मजबूत हों।
कवि सम्मेलन में मराठी की विभिन्न बोलियों की कविताओं का पाठ किया गया। अलग-अलग विषयों पर प्रस्तुत कविताओं ने सम्मेलन को ऐतिहासिक बना दिया। इस अवसर पर छत्रपति आबाजीराजे भोसले के हाथों सभी कवियों का सम्मान किया गया।
कार्यक्रम का संचालन किशोर टिळेकर ने किया, जबकि सूर्यकांत नामुगडे ने उपस्थित अतिथियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।



