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कीर्तन के माध्यम से संत विचारों का शुद्ध रूप में प्रबोधन करें : डॉ. उल्हासदादा पवार

कीर्तन के माध्यम से संत विचारों का शुद्ध रूप में प्रबोधन करें : डॉ. उल्हासदादा पवार

आलंदी में ‘साहित्य निष्ठांची मांदियाळी’ संत साहित्य नांदी सम्मेलन का उद्घाटन संपन्न

रिपोर्ट :विशाल समाचार 

स्थान:पुणे आलंदी महाराष्ट्र 

पुणे/आलंदी,  : वारकरी संप्रदाय संतों के विचारों की विरासत को संजोने आपवाला ज्ञानसमृद्ध संप्रदाय है। यह संप्रदाय समानता, भाईचारे और अनुशासन की विश्व की सबसे बड़ी परंपरा को आगे बढ़ाता है। इसलिए कीर्तन के माध्यम से संतों के विचारों का शुद्ध रूप में प्रबोधन होना आवश्यक है। ये विचार वरिष्ठ साहित्यकार एवं संत साहित्य के गहन अध्येता डॉ. उल्हासदादा पवार ने व्यक्त किए।

विश्वशांति केंद्र, आलंदी, माईर्स एमआईटी, पुणे, महाराष्ट्र साहित्य परिषद तथा महाराष्ट्र शासन के मराठी भाषा विभाग के संयुक्त तत्वावधान में 100वें साहित्य सम्मेलन की पृष्ठभूमि में आलंदी में आयोजित 17वें नांदी सम्मेलन में वे अध्यक्ष के रूप में बोल रहे थे। सम्मेलन का उद्घाटन प्रख्यात गायिका उषाताई मंगेशकर के हाथों हुआ। इस अवसर पर पूर्व साहित्य सम्मेलन अध्यक्ष एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. श्रीपाल सबनीस प्रमुख अतिथि के रूप में उपस्थित थे।

 

69वें साहित्य सम्मेलन के स्वागताध्यक्ष तथा माईर्स विश्वशांति विद्यापीठ के संस्थापक अध्यक्ष विश्वधर्मी प्रा. डॉ. विश्वनाथ कराड का इस अवसर पर विशेष सम्मान किया गया।

 

कार्यक्रम में महाराष्ट्र साहित्य परिषद के कोषाध्यक्ष प्रदीप निफाडकर, कार्यवाह सुनील महाजन, राजन लाखे, प्रभाकर ओव्हाल, बबनराव कुर्हाडे, आलंदी नगर परिषद की उपाध्यक्ष सुजाता तापकीर, नगरसेविका पूजा घुंडरे तथा माईर्स एमआईटी संस्था की महासचिव प्रा. स्वाती कराड-चाटे सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। इस अवसर पर विशेष स्मारिका का विमोचन भी किया गया।

 

मराठी भाषा संस्कृति की सच्ची वाहक : डॉ. उल्हासदादा पवार

 

डॉ. उल्हासदादा पवार ने कहा कि भाषा संस्कृति की सच्ची वाहक है। अपनी समृद्ध लोकसंस्कृति को जीवित रखना है, तो मराठी भाषा का संरक्षण और संवर्धन करना आवश्यक है। आज समाज में विवाद और मतभेद बढ़ाने के बजाय संत साहित्य पर संवाद और विचार-विमर्श होना चाहिए।

 

संत विचारों से ही समाज में नैतिकता और एकता संभव : डॉ. श्रीपाल सबनीस

डॉ. श्रीपाल सबनीस ने कहा कि संतत्व का साथ छोड़ने के कारण ही समाज का नैतिक पतन हुआ है। पाखंड और अंधविश्वास को दूर कर सभी को संतों के विचारों के आधार पर एकात्म महाराष्ट्र के निर्माण के लिए प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संत परंपरा के माध्यम से विश्वशांति का ध्येय रखने वाले प्रा. डॉ. विश्वनाथ कराड, ‘यह विश्व ही मेरा घर है’ का संदेश देने वाले संत ज्ञानेश्वर के सच्चे अनुयायी हैं।

 

संत ज्ञानेश्वर की रचनाओं को संगीत के माध्यम से घर-घर पहुंचाया : उषाताई मंगेशकर

 

उषाताई मंगेशकर ने कहा कि संत ज्ञानेश्वर की ‘भावार्थदीपिका’ की ओवियों को हृदयनाथजी ने संगीत से सजाया और लतादीदी ने अपनी मधुर आवाज के माध्यम से उन्हें घर-घर तक पहुंचाया। माउली की इस पावन भूमि पर डॉ. कराड द्वारा निस्वार्थ भाव से किया जा रहा कार्य सराहनीय है।

 

नई पीढ़ी में संत साहित्य के विचारों को रोपना जरूरी : प्रा. स्वाती कराड-चाटे

 

प्रा. स्वाती कराड-चाटे ने कहा कि मराठी भाषा का संवर्धन करना और अगली पीढ़ी को उसकी पहचान कराना शैक्षणिक संस्थानों की जिम्मेदारी है। अच्छे साहित्य से ही समाज समृद्ध बनता है, इसलिए बच्चों में संत साहित्य के विचारों के संस्कार विकसित किए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि नांदी सम्मेलन के माध्यम से ज्ञानेश्वर माउली की पावन भूमि पर ‘तीर्थक्षेत्र से ज्ञानतीर्थक्षेत्र की ओर’ होने वाली यह यात्रा मराठी भाषा को और अधिक मजबूती प्रदान करेगी।

 

इस अवसर पर महाराष्ट्र साहित्य परिषद के कोषाध्यक्ष प्रदीप निफाडकर और कार्यवाह सुनील महाजन ने पुणे में आयोजित होने वाले 100वें अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन में आलंदी के साहित्यप्रेमियों से बड़ी संख्या में शामिल होने का आह्वान किया।

 

कार्यक्रम का संचालन डॉ. अतुल कुलकर्णी ने किया, जबकि डॉ. महेश थोरवे ने आभार व्यक्त किया।

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