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इटावा: डीपीआरओ बनवारी सिंह पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, सूत्रों का दावा—खबरें भी करवा रहे हैं “प्रायोजित”

इटावा: डीपीआरओ बनवारी सिंह पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, सूत्रों का दावाखबरें भी करवा रहे हैं “प्रायोजित”

 

इटावा ,यूपी: विशेष संवाददाता

जिला पंचायत राज अधिकारी (डीपीआरओ) बनवारी सिंह एक बार फिर विवादों के घेरे में हैं। सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, डीपीआरओ पर लगातार आरोप लग रहे हैं कि वे जनपद इटावा में पंचायत फंड के दुरुपयोग और कमीशनबाज़ी के गंभीर खेल में लिप्त हैं। खास बात यह है कि जब भी उन पर उंगलियां उठती हैं, वे अखबारों में प्रायोजित खबरें प्रकाशित करवा कर खुद को “बेगुनाह” दिखाने की कोशिश करते हैं।

 

मार्च 2025 में छपी रिपोर्ट भी सवालों के घेरे में

मार्च 2025 में एक स्थानीय समाचार पत्र में छपी रिपोर्ट — “वित्तीय वर्ष में बचे 10 दिन, कैसे खर्च हों नौ करोड़ रुपये?” — को भी इसी रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है। जबकि रिपोर्ट का उद्देश्य जनजागरण प्रतीत होता है, मगर सूत्रों का कहना है कि यह खबर डीपीआरओ के बचाव में प्लानिंग के तहत प्रकाशित कराई गई थी।

 

सूत्रों का बड़ा खुलासा: “बिना कमीशन न फंड, न काम”

स्थानीय पंचायतों के सचिवों और प्रधानों से जुड़े सूत्रों ने खुलासा किया कि जब तक वे निर्धारित “कमीशन” नहीं देते, तब तक उनके विकास कार्यों के लिए आवंटित बजट को डीपीआरओ द्वारा स्वीकृति नहीं मिलती। एक प्रमुख सूत्र ने कहा:

“इटावा में पंचायतों का विकास नहीं, कमीशन सिस्टम चलता है। डीपीआरओ के पास गए बिना और उनका हिस्सा तय हुए बिना कोई फाइल आगे नहीं बढ़ती।”

यह स्पष्ट संकेत है कि इटावा में सरकारी योजनाओं का लाभ आम जनता तक नहीं पहुँच रहा, बल्कि भ्रष्ट तंत्र में फंसकर रह गया है।

डीपीआरओ की तैनाती पर भी उठे सवाल — ‘एक ही जगह वर्षों से क्यों?’

जहां एक ओर ज़िले के डीएम, एसपी, सीडीओ जैसे शीर्ष अधिकारी हर 2–3 साल में ट्रांसफर होते हैं, वहीं डीपीआरओ बनवारी सिंह पिछले 5 से 7 वर्षों से एक ही जगह पर जमे हुए हैं। सूत्र सवाल करते हैं:

“क्या यही भ्रष्टाचार को पनपाने का आधार नहीं बनता? जब अधिकारी वर्षों तक एक ही कुर्सी पर बना रहे, तो सिस्टम उनके अधीन हो जाता है और पारदर्शिता खत्म।”

 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर नीति के बावजूद इस तरह की जमे-जमाई तैनातियाँ प्रशासनिक नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।

 

फिर छपवाई बचाव में खबर: “माल न मिलने पर प्रचार का सहारा”

सूत्रों ने यह भी बताया कि जून 2025 में एक और खबर डीपीआरओ के पक्ष में प्रकाशित करवाई गई। यह कदम तब उठाया गया जब ज़मीनी स्तर पर उन पर आरोपों की झड़ी लगने लगी थी और जनविकास में कोई ठोस कार्य न होने पर सवाल उठाए गए। आरोप है कि ये खबरें केवल छवि प्रबंधन और सच्चाई से ध्यान भटकाने की कवायद हैं।

 

रिपोर्टर की कलम से डरते हैं अफसर? झूठे मुकदमों का डर

यह भी सामने आया है कि यदि कोई पत्रकार जिला इटावा में किसी विभाग  ,डीपीआरओ के भ्रष्टाचार की पोल खोलने का प्रयास करता है, तो उस पर जिला प्रशासन के माध्यम से दबाव बनाया जाता है और झूठे मुकदमे दर्ज और चैनल बंद कराए जाने की  धमकी दी जाती है।

कुछ माह पूर्व एक दो  विभाग  के भ्रष्टाचार की सबूत के साथ खबर चलाई तो, झूठे मुकदमे दर्ज कराने की कोशिश पूरी तरह की गई मगर सच्चाई के आगे झूठ  एसपी कार्यालय और डीएम कार्यालय इटावा में टिका नहीं।

इससे स्पष्ट है कि पारदर्शिता की बात करने वाले पत्रकारों के लिए प्रशासनिक तंत्र खुद खतरा बनता जा रहा है। और विभागों में 15 वर्षों से एक जगह पर टिका है लोग—क्या प्रशासन ने कोई कार्रवाई की?

 

मुख्य विकास भवन इटावा कार्यालय में भी घोटाले के आरोप

सूत्रों से खबर निकल कर आई है कि मुख्य विकास भवन इटावा कार्यालय के जिला पंचायती राज अधिकारी डीपीआरओ बनवारी सिंह का खेल निराला है।

स्वच्छता अभियान में भी बड़ा घोटाला सामने आया है। ग्राम पंचायत के गांवों में कचड़ा उठाने वाले ई-रिक्शा की खरीदारी में घोटाला हुआ। प्रति ई-रिक्शा 1 लाख 30 हजार की खरीददारी की गई, जबकि प्रशासन से प्रति ई-रिक्शा 2 लाख से अधिक पैसा निकाला गया है।

इसके अलावा कुछ पेमेंट सचिवालय से होती है, वह पेमेंट मुख्य विकास भवन इटावा से निकाली गई जिसमें प्रत्येक पेमेंट पर प्रधानों से 5 हजार रूपए घूस लेते रहे।

कुछ पेमेंट ग्राम पंचायत एवं ब्लॉक स्तर से निकलनी चाहिए थी, वह भी पेमेंट एक जगह से कमीशनबाजी पर निकाली गई। जबकि डोंगल लगाकर ग्राम पंचायत व ब्लॉक से निकलनी चाहिए थी—उसमें भी घोटाला किया गया।

सूत्रों की मांग है कि इस पूरे मामले की सीबीआई और ईडी द्वारा जांच कराई जाए।

 

मुख्यमंत्री योगी से मांग: जांच कर दोषियों को बख्शा न जाए

सूत्रों की स्पष्ट मांग है कि मुख्यमंत्री को इस पूरे मामले में तत्काल संज्ञान लेकर जांच करानी चाहिए। जो अधिकारी वर्षों से एक ही जनपद में जमा हुआ है, उसका तबादला तुरंत कर सख्त कार्रवाई की जाए। केवल तभी जनकल्याण की योजनाएं सही तरीके से धरातल पर उतर सकेंगी।

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