
“भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के दावे करती योगी सरकार, मगर जनसुनवाई की हकीकत पर उठे सवाल”
जनसुनवाई या ‘जन-ठगाई’? – योगी सरकार के दावों पर सवाल
योगी सरकार बार-बार यह दावा करती है कि प्रदेश में भ्रष्टाचार पर नकेल कसी जा रही है। हर मंच से कहा जाता है कि शिकायत दर्ज होते ही दोषियों पर कार्रवाई होगी और जनता को न्याय मिलेगा। लेकिन इटावा और कानपुर मंडल से जुड़ा हालिया मामला इस पूरी व्यवस्था की पोल खोल देता है।
शिकायतकर्ता शिवाय राजपूत ने भ्रष्टाचार को लेकर जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत दर्ज की। लेकिन जो हुआ वह चौंकाने वाला है। प्रभागीय निदेशक, सामाजिक वानिकी प्रभाग, इटावा ने 31 जुलाई 2025 को रिपोर्ट लगाई और ठीक उसी पैटर्न, लगभग हूबहू भाषा में मुख्य वन संरक्षक, कानपुर मंडल ने 8 अगस्त 2025 को वही रिपोर्ट दोहराई। यानी शिकायत पर गंभीर जांच करने के बजाय सिर्फ़ खानापूरी हुई।
यह किसी एक मामले की बात नहीं है। यह इस बात का प्रतीक है कि विभागों में आज भी भ्रष्टाचारियों को बचाने का खेल जारी है। शिकायतकर्ता से फोन पर बातचीत करके रिपोर्ट तैयार कर दी गई, न कोई मौके पर जांच, न ही साक्ष्य जुटाने का प्रयास। सवाल यह है कि अगर यही जनसुनवाई है तो फिर जनता को न्याय कहाँ मिलेगा?
योगी सरकार कहती है कि अब भ्रष्टाचारियों को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन जनता पूछ रही है कि क्या यही नकेल कसना है कि हर बार एक जैसी रिपोर्ट लगाकर भ्रष्टाचारियों को संरक्षण दिया जाए?
जनता का विश्वास तभी बचेगा जब—हर शिकायत पर स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो।डिजिटल पोर्टल पर पारदर्शी तरीके से कार्रवाई की जानकारी डाली जाए।
और सबसे महत्वपूर्ण—जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो, वरना सिस्टम में बैठी मिलीभगत ऐसे ही जनता की आवाज़ दबाती रहेगी।
योगी सरकार को तय करना होगा कि वह जनता की आवाज़ के साथ खड़ी है या भ्रष्टाचारियों की ढाल बनी हुई नौकरशाही के साथ।
✍️ संपादकीय (विशाल समाचार टीम)

