सह्याद्री की गोद में बसा अभेद्य दुर्ग – प्रतापगढ़
मुंबई, (मोहन सिंह तोमर): सह्याद्री की ऊँच-नीच पर्वतरांगों, गहन वनों और नागमोडी घाटों के बीच गर्व से खड़ा प्रतापगढ़ किला मराठा इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। सातारा ज़िले के जावली तालुका अंतर्गत महाबलेश्वर से 13 किलोमीटर दूरी पर समुद्रसपाटी से 1,092 मीटर ऊँचाई पर स्थित यह किला महाराष्ट्र के प्रमुख डोंगरी दुर्गों में गिना जाता है।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने जावली खोरे जीतने के बाद 1656 में मोरो त्रिंबक पिंगळे को यह किला बनवाने का आदेश दिया। प्रतापगढ़ मुख्य दुर्ग, माची और बालेकिला इन तीन भागों में विभाजित है। इसके ऊँचे बुरुजों से आसपास की दऱियों और घाटियों पर सतत नज़र रखी जा सकती थी। गोमुखी शैली में निर्मित महादरवाजा और भक्कम तटबंदी उस काल की अद्वितीय संरक्षणकला को दर्शाते हैं।
किले की जलव्यवस्था भी अत्यंत विशेष है। यहाँ चार प्रमुख जलाशय बनाए गए थे जिनमें वर्षा का पानी सुरक्षित रखा जाता था। इस प्रणाली से वर्षभर पर्याप्त जलसंपदा उपलब्ध रहती थी।
प्रतापगढ़ का ऐतिहासिक महत्त्व 1659 में अफज़लखान–शिवाजी महाराज भेंट और उसी प्रसंग में अफज़लखान के वध से और भी बढ़ा। स्वातंत्र्योत्तर काल में किले पर छत्रपति शिवाजी महाराज का भव्य अश्वारूढ़ पुतला स्थापित किया गया, जिसका अनावरण 1957 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने किया।
आज भी प्रतापगढ़ मराठा सामर्थ्य और स्वराज्य के स्वप्न का जिवंत प्रतीक है। यहाँ प्रतिवर्ष शिवजयंती बड़े उत्साह से मनाई जाती है तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों से यह दुर्ग महाराष्ट्र की अस्मिता और सांस्कृतिक एकता का केंद्र बनता है।
युनेस्को ने छत्रपति शिवाजी महाराज के 12 किलों को विश्व धरोहर का दर्जा प्रदान किया है, जिनमें प्रतापगढ़ को विशेष स्थान प्राप्त है। इस मान्यता से प्रतापगढ़ न केवल महाराष्ट्र बल्कि सम्पूर्ण विश्व की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में प्रतिष्ठित हुआ है।
संजय डी. ओरके
विभागीय संपर्क अधिकारी,
माहिती व जनसंपर्क महासंचालनालय,
मंत्रालय, मुंबई



