संपादकीय

अनुशासनहीनता, लाठीचार्ज और भाजपा की साख का सवाल

अनुशासनहीनता, लाठीचार्ज और भाजपा की साख का सवाल

संपादकीय टीम विशाल समाचार 

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी का हालिया बयान चौंकाने वाला है। वे जनप्रतिनिधियों की आपसी बयानबाज़ी को अनुशासनहीनता बताते हैं, लेकिन यही सवाल उठता है कि जब जनता पर लाठी बरसाई जाती है, तब इसे कौन-सी अनुशासनप्रियता कहा जाएगा? क्या जरूरत थी लाठीचार्ज की? क्या प्रशासन और संगठन पहले ही स्थिति को सुलझा नहीं सकते थे? हर राज्य में यही देखने को मिलता है कि जब हालात बिगड़ते हैं, तो सबसे आसान रास्ता जनता पर डंडा चलाना ही माना जाता है।

 

सोचने वाली बात है—अगर इस लाठीचार्ज में नेताओं के अपने बच्चे-बच्चियां होते तो क्या तब भी यही रुख अपनाया जाता? जनता की पीड़ा और गुस्से को समझे बिना बल प्रयोग करना केवल असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर चोट है।

 

भूपेंद्र सिंह चौधरी का यह भी कहना रहा है कि “25 और 50 लाख का कोई घोटाला नहीं होता”—ऐसे बयान न केवल सवालों को दबाने की कोशिश हैं, बल्कि भ्रष्टाचार की संभावनाओं पर पर्दा डालने जैसे लगते हैं। आश्चर्य यह है कि ऐसे नेताओं को ही प्रदेश की कमान सौंपी जाती है। इसका असर पार्टी ने हाल ही में लोकसभा चुनावों में भुगता, और यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया तो 2027 में और भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

 

पार्टी संगठन को यह समझना होगा कि जब सत्ता में बैठे लोग अपनी जिम्मेदारी से बचने लगते हैं, और जनता के सवालों का जवाब देने की बजाय ताक़त का सहारा लेते हैं, तब विश्वास डगमगाने लगता है। यही वजह है कि आज भाजपा छोड़कर कई नेता दूसरी पार्टियों की ओर रुख कर रहे हैं।

 

पूर्व प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह का कार्यकाल अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा। उनके दौर में इस तरह की खबरें सामने नहीं आईं। यह बताता है कि सब कुछ व्यक्तित्व और नेतृत्व शैली पर निर्भर करता है।

 

आज की स्थिति “गांव तेरा, नाम मेरा” जैसी राजनीति को दर्शाती है—जहां उल्टा चोर ही कोतवाल को डांट रहा है। भाजपा को अब भी चेत जाना चाहिए। अगर संगठन के भीतर अनुशासन और जनता के प्रति संवेदनशीलता नहीं लाई गई, तो समय दूर नहीं जब जनता ही पार्टी को अनुशासन सिखाने के लिए तैयार होगी।

भाजपा को संभलना होगा, नहीं तो खामियाजा भुगतना तय है।

 

 

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