संपादकीय

“डीएम से फोन रिसीव न हुआ तो विधानसभा से नोटिस – नेता चाहते हैं प्रशासन उनके लिए बटन दबाए?”

डीएम से फोन रिसीव न हुआ तो विधानसभा से नोटिस – नेता चाहते हैं प्रशासन उनके लिए बटन दबाए?”

डीएम का कसूर – फोन न उठाना! क्या नेताओं के लिए प्रशासन जनता से बड़ा है?

बुलंदशहर की महिला जिलाधिकारी श्रुति का मामला उत्तर प्रदेश की नौकरशाही और राजनीति के रिश्तों की असल तस्वीर सामने लाता है। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और विधानसभा सदस्य शिवपाल यादव ने यह शिकायत कर दी कि डीएम ने उनका फोन 20–25 बार नहीं उठाया। यह शिकायत सीधे विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना तक पहुँची और उन्होंने तत्काल नोटिस जारी कर दिया।

इतनी त्वरित कार्रवाई देखकर कोई भी दंग रह जाएगा। क्या किसी अधिकारी का सबसे बड़ा अपराध यही है कि उसने विधायक का फोन रिसीव नहीं किया? क्या विधायक के फोन न उठाने पर सीधे विधानसभा के मंच से नोटिस जारी करना न्यायसंगत है?

डीएम श्रुति ने बाद में माफी माँगी और शिवपाल ने उन्हें माफ भी कर दिया। लेकिन सवाल यही है कि यह माफी किस बात की थी? क्या प्रशासन के काम का असली पैमाना अब यह हो गया है कि वे नेताओं के कॉल तुरंत उठाएँ, वरना कटघरे में खड़े हों?

 

नेताओं का ग़लत संदेश

यह प्रकरण साफ़ करता है कि नेताओं के लिए लोकतंत्र का मतलब है – प्रशासन पहले हमारे लिए काम करे, फिर जनता को देखे।

जब जनता बार–बार फोन करती है, दफ्तरों के चक्कर काटती है, तो नेताओं को शायद ही इतनी बेचैनी होती हो। लेकिन जब एक नेता का फोन नहीं उठता, तो पूरा प्रशासनिक तंत्र हिल जाता है। यह ग़लत संदेश है।

 

महिला अफसर की गरिमा पर चोट

 

एक महिला अधिकारी को केवल फोन न उठाने पर सार्वजनिक रूप से अपमानित करना लोकतांत्रिक गरिमा के विपरीत है।

अगर अफसर से कोई शिकायत थी, तो उसके औपचारिक रास्ते हैं – बैठकें, पत्राचार, विभागीय समीक्षा। लेकिन सत्ता के अहंकार में नेताओं को सब कुछ तुरंत चाहिए – और अगर उनकी इच्छा पूरी न हो तो नोटिस और बेइज्ज़ती।

जनता के लिए कौन खड़ा होगा?

पत्रकारिता का बड़ा सवाल यही है – क्या अफसर नेताओं के निजी फोन रिसीव करने के लिए बैठे हैं या जनता की समस्याएँ सुलझाने के लिए?

आज का यह प्रकरण एक खतरनाक परंपरा को जन्म देता है। अगर नेताओं की नाराज़गी पर नोटिस जारी होंगे, तो अफसर जनता की जगह नेताओं की “कॉल लिस्ट” पूरी करने में ही व्यस्त रहेंगे।

फिर जनता की आवाज़ कौन सुनेगा?

लोकतंत्र या सत्ता का दंभ?: यह घटना लोकतंत्र की असली भावना पर सवाल खड़ा करती है। लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका – तीनों के बीच संतुलन होना चाहिए। लेकिन यहाँ तो विधायिका की ताक़त का इस्तेमाल सीधे एक अधिकारी को “ठीक” करने के लिए किया गया। यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि सत्ता का दंभ है।

निष्कर्ष:बुलंदशहर की यह घटना केवल डीएम श्रुति की नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की गरिमा पर चोट है।

नेताओं को यह समझना होगा कि अफसर उनकी चौकीदारी करने के लिए नहीं, जनता की सेवा और प्रशासन चलाने के लिए नियुक्त किए जाते हैं। अगर अफसर को फोन न उठाने पर सार्वजनिक बेइज्ज़ती झेलनी पड़ेगी, तो यह संदेश जाएगा कि लोकतंत्र नेताओं का “निजी क्लब” है, जनता का नहीं।

इस पूरे मामले ने साफ़ कर दिया है कि नेताओं के लिए प्रशासन का असली काम जनता नहीं, बल्कि उनका निजी फोन कॉल रिसीव करना है। सवाल यह है – लोकतंत्र आखिर किसके लिए है: जनता के लिए या नेताओं की कॉल बेल बजाने के लिए?

 

संपादकीय टीम विशाल समाचार 

 

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