पूणे

नवविध भक्तिकाओं की संत रचनाओं का अनोखा अनुभव

नवविध भक्तिकाओं की संत रचनाओं का अनोखा अनुभव

 

विदुषी नंदिनी राव और उस्ताद रईस बाले खान का श्रुतिमनोहर सादरीकरण

 

पुणे,  भक्तिभाव की नवीं अवस्थाओं – श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन – का वर्णन करने वाली देशभर की कई संतों की रचनाओं का रसिकों ने श्रुतिमनोहर अनुभव किया। विदुषी नंदिनी राव गुजर और उस्ताद रईस बाले खान ने अपनी गायकी से इस भक्तिरसपूर्ण संगीतमय मैफल को जीवंत कर श्रोताओं को गहरे भावों का अनुभव कराया।

 

यह अवसर कन्नड़ संघ, पुणे और कावेरी कलाक्षेत्र द्वारा आयोजित ‘भावसंगीत – भक्तीलहरी’ विशेष सांगीतिक मैफल का था। ‘सताररत्न’ की उपाधि से सम्मानित उस्ताद रईस बाले खान और संगीत नाटक अकादमी द्वारा 2022-23 में उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ युवा पुरस्कार से सम्मानित पुणे की युवा गायिका विदुषी नंदिनी राव गुजर ने अपने वाद्य कलाकारों के साथ भक्तिरचनाओं को नवविध स्वर में प्रस्तुत किया। वाडिया महाविद्यालय के रसायनशास्त्र विभाग के सेवानिवृत्त प्राध्यापक और संत साहित्य के वरिष्ठ विद्वान प्रो. गुरुराज कुलकर्णी ने संतरचनाओं का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया।

 

एरंडवणे स्थित कलमाडी हाईस्कूल के शकुंतला शेट्टी सभागृह में आयोजित इस मैफल में मराठी, हिंदी, कन्नड़, तेलुगु, तमिल, गुजराती, बंगाली, पंजाबी जैसी कई भाषाओं में रचित संतरचनाओं का समावेश था। संत ज्ञानेश्वर, संत एकनाथ, संत गोरा कुंभार, संत कबीर, संत मीरा, पुरंदरदास, कनकदास, तुलसीदास, रविदास, नरसी मेहता, गोपालदास जैसे संतों की रचनाओं के माध्यम से कलाकारों ने भक्त और ईश्वर के विविध संबंधों की झलक संगीत के जरिए दिखाई।

 

नंदिनी राव ने कन्नड़, तमिल और तेलुगु रचनाओं का मनमोहक सादरीकरण किया, जबकि उस्ताद रईस बाले खान ने मराठी, हिंदी और गुजराती रचनाओं की प्रस्तुति दी। चुनिंदा रचनाओं पर स्फूर्ति राव और मेघा हरतळीकर ने नृत्य द्वारा भाव और रस को और जीवंत किया।

 

साथी कलाकारों ने मैफल को और समृद्ध बनाया – यशवंत (मृदंगम्), अजय चंद्रमौळी (वायलिन), अर्ष शहा (गिटार), हेमंत जोशी (तबला), ओजस रानडे (हार्मोनियम), संतोष नाईक (बांसुरी), अनिष ठुसे (तालवाद्य), और कोरस – श्रीनिधि कुलकर्णी, सई मनोहर, अनघा मुतालिक देसाई।

 

आदिशंकराचार्य द्वारा रचित ‘भज गोविंदम्’ (रागमालिका) से शुरू हुई यह भावपूर्ण भक्तिगाथा संत ज्ञानेश्वर के पसायदान तक भावानुभूति में उत्तरोत्तर बढ़ती गई। किरवाणी, दुर्गा, यमन, षण्मुखप्रिया, बिभास, वृंदावनी सारंग, आसावरी – दरबारी, मोहनकल्याणी, मालकंस, खमाज, पटदीप, मधमाद सारंग, मिश्र कल्याण, मिश्र पहाड़ी, सारंग, भैरवी जैसे रागों के माध्यम से कलाकारों ने संतरचनाओं में निहित भक्तिभाव को श्रोताओं के हृदय में उतारा।

 

संतों द्वारा वर्णित नवविध भक्तिपथ और सामान्य भक्तों के लिए सगुण ईश्वर के माध्यम से निर्गुण निराकार की प्राप्ति के मार्ग का विस्तृत विवेचन प्रो. गुरुराज कुलकर्णी ने किया।

 

कन्नड़ संघ की सचिव मालती कलमाडी ने कहा, “यह मैफल केवल प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि यह भक्तिचलन का अनुभव था, जो प्रादेशिक और भाषाई सीमाओं को पार कर प्रवाहित हुआ। गायन, वादन, नृत्य और काव्य के माध्यम से संतों ने अपनी सांस्कृतिक विविधता का वैभव आम जनता के सामने प्रस्तुत किया।”

इस अवसर पर राधिका शर्मा ने कलाकारों का परिचय कराया और प्राचार्य ज्योती कडकोळने आभार व्यक्त किया।

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