“पराली का धुआँ—किसान की मजबूरी या प्रशासन की नाकामी?”
इटावा में पराली प्रबंधन को लेकर प्रशासन ने कड़े निर्देश जारी किए हैं। जिलाधिकारी ने साफ कहा—पराली जलाओगे तो जुर्माना भरोगे। पाँच हज़ार से लेकर तीस हज़ार तक की मार किसानों पर तय कर दी गई है। बाहर जनपद के कम्बाइन हार्वेस्टर पर पाबंदी और सीज़ करने की चेतावनी भी दे दी गई है।
निश्चित रूप से पराली जलाना पर्यावरण और मिट्टी दोनों के लिए ज़हर है। धुआँ लोगों की साँसें छीनता है, और खेत की उर्वरता को खत्म करता है। लेकिन असली सवाल है—क्या सिर्फ जुर्माने और सख्ती से हालात बदलेंगे?
किसान आज भी पराली जलाने को मजबूर क्यों है?क्या उसके पास महंगी मशीनरी खरीदने की ताक़त है?क्या हर गाँव में डिकम्पोज़र और मशीनरी बैंक मौजूद हैं?क्या पंचायतें और कृषि विभाग इस दिशा में सक्रिय दिखते हैं?
सच यही है कि किसानों को विकल्प दिए बिना उन पर जुर्माना थोपना दोहरी सज़ा जैसा है। छोटे किसान की जेब में पाँच हज़ार भी पहाड़ साबित होता है। बड़े किसानों के लिए भले तीस हज़ार चुकाना आसान हो, पर छोटे किसान के लिए यह खेती छोड़ने जैसा संकट है।
सरकार ने मशीनरी, डिकम्पोज़र और गौशालाओं तक पराली भेजने की बातें जरूर लिखी हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इन योजनाओं का असर कितना है? क्या कोई अधिकारी इसकी निगरानी करता है? या फिर यह सब सिर्फ फाइलों तक ही सीमित रह जाता है?
पराली प्रबंधन में सख्ती ज़रूरी है, मगर उससे पहले किसानों की मजबूरी दूर करना और विकल्प उपलब्ध कराना और भी ज़रूरी है। अगर किसान को सहूलियतें नहीं मिलेंगी तो प्रशासन के दंड आदेश महज़ काग़ज़ी हुक्मनामे साबित होंगे।
सवाल यही है—धुआँ किसका गुनाह है? किसान का… या व्यवस्था का?
संपादकीय टीम विशाल समाचार



