
लखनऊ से आया ‘गोलमाल’ पत्र — इटावा में आरोपी को ही बना दिया जांच अधिकारी!
मुख्यमंत्री कार्यालय के आदेशों को दरकिनार कर, जिला प्रशासन ने रच दिया ‘जांच बचाओ अभियान’
📰 (विशेष रिपोर्ट | विशाल समाचार | इटावा संवाददाता)
इटावा।उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय से जारी स्पष्ट आदेशों के बाद भी इटावा जिला प्रशासन में ‘जांच से ज्यादा जांच बचाने’ की कवायद खुलकर सामने आई है।
मामला ग्राम पंचायत विभाग से जुड़ी गंभीर शिकायतों का है — और अब इसमें सत्ता, रिश्तेदारी और प्रशासनिक खेल की मिली-जुली पटकथा दिखाई दे रही है।
मुख्यमंत्री कार्यालय का आदेश, लेकिन आरोपी बना जांच अधिकारी
27 सितंबर 2025 को मुख्यमंत्री कार्यालय से आदेश हुआ कि इटावा के जिलाधिकारी पंचायत विभाग में दर्ज शिकायत की जांच करवाएं।
जिलाधिकारी ने यह आदेश मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) को भेजा — लेकिन सीडीओ ने ऐसा कदम उठाया जिसने शासन व्यवस्था की साख पर सवाल खड़ा कर दिया।
जांच का जिम्मा उसी अधिकारी को सौंप दिया गया, जिसके खिलाफ शिकायत दर्ज थी!
शिकायतकर्ता को न तो कोई सूचना दी गई, न जांच में शामिल किया गया।
सूत्र बताते हैं कि आरोपी अधिकारी ने अपने बचाव में फर्जी आंकड़े और मनगढ़ंत रिपोर्ट तैयार कर जिलास्तर की जांच को भ्रमित करने की कोशिश की।
लखनऊ से आया संदिग्ध पत्र — बिना दिनांक, बिना पारदर्शिता
3 अक्टूबर को लखनऊ के पंचायतीराज निदेशालय से एक संदिग्ध पत्र आया।
पत्र में शासन के पुराने (29 जनवरी 2024) शासनादेश का हवाला देते हुए लिखा गया कि शिकायत “नियम अनुसार नहीं की गई” —
परंतु चौंकाने वाली बात यह थी कि पत्र पर कोई स्पष्ट दिनांक नहीं था, और यह मुख्यमंत्री कार्यालय के आदेश के बाद जारी किया गया था।
अब सवाल यह कि जब मुख्यमंत्री कार्यालय ने पहले ही जांच का आदेश जारी कर दिया था,
तो फिर बाद में पुराने शासनादेश का हवाला देकर नया पत्र क्यों और किसके दबाव में जोड़ा गया?
रिश्तेदारी में सांसद का नाम — क्या यही वजह है ‘सुरक्षा कवच’ की?
सूत्रों का कहना है कि जिस अधिकारी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं,
उसकी एक सांसद से रिश्तेदारी चर्चा में है।
यही कारण है कि अब जिले भर में यह सवाल गूंज रहा है —
क्या यही संबंध जांच को मोड़ने में मददगार बना
भ्रष्टाचार का पुराना रिकॉर्ड — बागपत से लेकर इटावा तक फैला नेटवर्क
“विशाल समाचार” को 54 पन्नों की गोपनीय फाइल हाथ लगी है,
जिसमें इस अधिकारी के पुराने कार्यकाल से जुड़े चौंकाने वाले सबूत मौजूद हैं।
इनमें फर्जी भुगतान, फर्जी एमआईएस डेटा, और कार्यों के बदले कमीशन तक के दस्तावेज शामिल हैं।
इतना ही नहीं, बागपत में वर्ष 2021 में इसी अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के विरोध में धरना-प्रदर्शन तक हुए थे।
इसके बाद तबादला कर इटावा भेज दिया गया — और यहां पहुंचकर वही कहानी दोहराई गई।
कार्यालय के भीतर की कहानी — महिला कर्मचारी ने खोली पोल
इटावा के डीपीआरओ कार्यालय में कार्यरत एक महिला कर्मचारी ने भी छेड़छाड़ और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे।
दो बार उसने पुलिस अधीक्षक इटावा को शिकायत दी,
परंतु दोनों बार प्रशासनिक दबाव में मामला “राजीनामा” करवा कर दबा दिया गया।
बाद में उसने एक मीडिया चैनल पर आकर डीपीआरओ कार्यालय के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया —
जिसके बाद उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
क्या यह प्रशासनिक बदले की कार्रवाई नहीं?
अब और शिकायतें — पर ‘लंबे हाथों’ ने सब संभाल लिया
कानपुर, लखनऊ और इटावा तक कई शिकायतें भेजी गईं,
लेकिन डीपीआरओ के खिलाफ किसी भी स्तर पर कार्रवाई नहीं हुई।
सूत्रों का कहना है — “इनके हाथ लंबे हैं, और ऊपर तक पहुंच है,
इसीलिए नियमों को ताक पर रखकर कुर्सी पर जमे बैठे हैं।”
अगर राज्य सरकार ने कार्रवाई नहीं की, तो केंद्र तक जाएगी फाइल
अगर उत्तर प्रदेश सरकार इटावा डीपीआरओ की ठीक से जांच नहीं करवाती है,
तो निश्चित तौर पर केंद्र सरकार का सहारा लिया जाएगा।
“विशाल समाचार” के पास मौजूद 54 पन्नों की फाइल और डीपीआरओ कार्यालय के कर्मचारी का वीडियो बयान
जल्द ही केंद्र सरकार को सौंपा जाएगा, ताकि भ्रष्टाचार के इस जाल का पर्दाफाश राष्ट्रीय स्तर पर हो सके।
अब जरूरी है निष्पक्ष जांच — स्थानीय नहीं, केंद्रीय एजेंसी से
पूरा मामला अब सिर्फ एक अधिकारी या शिकायत का नहीं,
बल्कि पूरी प्रशासनिक पारदर्शिता और शासन की विश्वसनीयता का है।
अगर मुख्यमंत्री कार्यालय के आदेशों के बावजूद आदेशों को दरकिनार किया जा सकता है,
तो यह उत्तर प्रदेश की नौकरशाही पर गहरा प्रश्न है।
“विशाल समाचार” की मांग स्पष्ट है —
> इटावा डीपीआरओ और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ जांच विजिलेंस, एंटी करप्शन, सीबीआई या ईडी जैसी केंद्रीय एजेंसियों से कराई जाए,
वह भी किसी अन्य जिले या राज्य की टीम द्वारा, ताकि स्थानीय दबावों से मुक्त होकर सच सामने आ सके।
> अभी तो खेल की शुरुआत है। आगे-आगे देखते जाओ होता है क्या — यह तो सिर्फ अंगड़ाई है, असली लड़ाई तो बाकी है।
सबूतों के आधार पर कार्रवाई तो करनी ही पड़ेगी।
अगर राज्य सरकार नहीं करती, तो केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करना ही पड़ेगा।
क्यों न सभी पुराने रिकॉर्ड खंगाले जाएं — ताकि सच्चाई पूरी तरह सामने आ सके?(विशाल समाचार की यह रिपोर्ट एकत्रित दस्तावेज़ों, शिकायतों और प्राप्त फाइलों के विश्लेषण पर आधारित है।)


