पूणे

स्थानीय स्वराज संस्थाओं के चुनाव मतपत्रिका से कराए जाएं!

स्थानीय स्वराज संस्थाओं के चुनाव मतपत्रिका से कराए जाएं!

बसपा महासचिव डॉ. हुलगेश चलवादी की मांग

‘वीवीपैट’ टालने से संशय और गहराया

पुणे :स्थानीय स्वराज संस्थाओं के चुनाव ईवीएम के बजाय मतपत्रिका से कराए जाएं, ऐसी जोरदार मांग बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश महासचिव तथा पश्चिम महाराष्ट्र जोन के मुख्य प्रभारी डॉ. हुलगेश चलवाड़ी ने मंगलवार (11 नवम्बर) को की।

डॉ. चलवादी ने कहा कि —

“‘ईवीएम नहीं — मतपत्रिका पर ही मतदान हो’, यही बसपा की शुरू से स्पष्ट भूमिका रही है। मतपत्रिका ही मतदाताओं की इच्छा का सच्चा प्रतिबिंब दिखाती है।”

उन्होंने निर्वाचन आयोग से तत्काल पुनर्विचार कर पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया हेतु मतपत्रिका आधारित मतदान प्रणाली लागू करने का आवाहन किया।

राज्य निर्वाचन आयोग ने इन चुनावों में ‘वीवीपैट’ मशीन का उपयोग नहीं करने का निर्णय घोषित किया है।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. चलवादी ने कहा कि —

“आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि यह निर्णय लेकर वह किन राजनीतिक शक्तियों का संरक्षण कर रहा है?”

नागपुर खंडपीठ (उच्च न्यायालय) ने एक लंबित याचिका की सुनवाई करते हुए राज्य निर्वाचन आयोग से पूछा है —

“‘वीवीपैट’ का उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा है?” — इसका स्पष्टीकरण दें।

डॉ. चलवादी ने कहा कि मतदाताओं का विश्वास बनाए रखने के लिए चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होना आवश्यक है।

पूरे ईवीएम सिस्टम को लेकर जनता में पहले से ही संदेह है।

मतदान के बाद मतदाता को अपने मतदान का दृश्यमान प्रमाण (वीवीपैट पर्ची) मिलना चाहिए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

लेकिन आयोग द्वारा ‘वीवीपैट’ प्रणाली को टालने से लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा हुआ है, ऐसा डॉ. चलवादी ने कहा।

मतदाता सूची पर भी संशय!

राज्य निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची में दोहरे नाम वाले मतदाताओं की पहचान कर यह जानकारी ली जाएगी कि वे कहाँ मतदान करेंगे।

मगर डॉ. चलवादी ने सवाल उठाया —

“क्या यह व्यावहारिक रूप से संभव है? जिस मतदाता सूची पर ही भरोसा नहीं, उसी सूची पर चुनाव कैसे हो सकते हैं?”

उन्होंने कहा कि मतदाता सूची में त्रुटियाँ, नामों का गायब होना, दोहरी प्रविष्टियाँ, गलत पते, और एक ही पते पर कई मतदाताओं का नाम दर्ज होना — ये सभी गंभीर अनियमितताएँ हैं।

फिर भी उसी त्रुटिपूर्ण सूची का आगामी चुनावों में उपयोग करना, आयोग की निर्णय-क्षमता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

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