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राजनीति के जाल में फँसा तेंदुआ!:-डॉ हुलगेश चलवादी

राजनीति के जाल में फँसा तेंदुआ!

चुनाव से ठीक पहले तेंदुओं की शहरी हलचल क्यों बढ़ी?

बसपा महासचिव डॉ. हुलगेश चलवादी का प्रशासन से तीखा सवाल

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पुणे,महाराष्ट्र विशाल समाचार

ईवीएम और मतदाता सूची में गड़बड़ियों के बाद अब महाराष्ट्र, विशेषकर पुणे जिले में तेंदुओं का ‘राजनीतिक जाल’ में फँसना नई चर्चा का विषय बना है। स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं के चुनाव के ऐन पहले तेंदुओं की शहरी क्षेत्रों में बढ़ती हलचल, हमले और उन्हें पकड़ने के प्रयासों में प्रशासन पर बढ़ता दबाव…इन सभी घटनाओं से “कुछ तो गड़बड़ है” ऐसा संदेह निर्माण हो रहा है। यह गंभीर आरोप बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश महासचिव, पश्चिम महाराष्ट्र ज़ोन प्रमुख व पूर्व नगरसेवक डॉ. हुलगेश चलवादी ने मंगलवार (9 दिसंबर) को लगाया।

 

डॉ. चलवादी ने कहा कि पिछले पाँच दशकों में तेंदुओं का शहरी क्षेत्रों में आना-जाना या हमले जैसी घटनाएँ लगभग सुनाई नहीं देती थीं। लेकिन चार साल से लंबित स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं के चुनाव का माहौल बनते ही अचानक तेंदुए बाहर क्यों निकलने लगे? यह प्रशासन और सरकार के लिए गंभीर सवाल है।

 

उन्होंने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न उठाया। “इतनी विशाल वन विभाग की मशीनरी होने के बावजूद आज तक तेंदुओं की सटीक संख्या, उनका मूवमेंट और शहरी व ग्रामीण इलाकों पर नियंत्रण क्यों नहीं हो पाया? क्या सचमुच सभी जंगल नष्ट हो गए हैं? क्या पुणे का प्राकृतिक संतुलन ख़तरे में है?”—ऐसे तीखे सवाल डॉ. चलवादी ने उपस्थित किए।

साथ ही उन्होंने नागपुर में चल रहे शीतकालीन अधिवेशन में सरकार से इस मुद्दे पर जवाब देने और भयभीत पुणेकरों को सुरक्षा की ठोस गारंटी देने की माँग की।

 

उन्होंने आगे कहा कि पुणे ज़िले में तेंदुओं का शहर और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में प्रवेश अब भयावह स्तर पर पहुँच चुका है, लेकिन प्रशासन ‘कागज़ी कार्रवाई’ और सत्ताधारी दल ‘राजनीतिक लाभ-हानि’ में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं। शिरूर, जुन्नर, आंबेगांव से लेकर पुणे शहर के औंध, बावधन और विमानतल परिसर तक तेंदुओं की बढ़ती मौजूदगी स्पष्ट दिखाई दे रही है—लेकिन प्रभावी रोकथाम कहीं नज़र नहीं आती।

 

मानव विस्तार के कारण तेंदुओं के प्राकृतिक आवास नष्ट होने, गन्ने की खेती में उन्हें मिलने वाला अस्थायी आसरा, और शहरों में बढ़ती आवारा कुत्तों की संख्या तेंदुओं के लिए आसान आहार बनने—इन मूल कारणों पर सरकार के पास कोई ठोस नीति नहीं है। परिणामस्वरूप मानव–तेंदुआ संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है।

 

डॉ. चलवादी ने चेतावनी देते हुए कहा कि सरकार और वन विभाग ने अगर तुरंत ठोस नीति, क्षेत्र-वार सर्वेक्षण, वैज्ञानिक समाधान और प्रभावी सुरक्षा उपाय लागू नहीं किए, तो आने वाले दिनों में यह संकट और गंभीर रूप ले सकता है।

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