
नेताओं की मजबूरी पर वफादारी का चोला
रिपोर्ट;:संजय सक्सेना,वरिष्ठ पत्रकार
स्थान:लखनऊ उत्तर प्रदेश
राजनीति में वफादारी और मजबूरी के बीच की लकीर अक्सर इतनी पतली होती है कि आम आदमी तो क्या, खुद नेता भी भूल जाते हैं कि वे किस तरफ खड़े हैं। तृणमूल कांग्रेस के तीन सांसदों शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आजाद और बाबुल सुप्रियो की कहानी इसी सच्चाई की एक जीती-जागती मिसाल है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी की करारी हार के बाद जब पार्टी के करीब बीस सांसद बगावत पर उतर आए और मोदी सरकार के साथ खड़े होने का एलान कर दिया, तब यही तीनों नेता दीदी यानी ममता बनर्जी की वफादारी का ढिंढोरा पीटने में लगे हैं। शत्रुघ्न सिन्हा ने बयान दिया कि वे ममता जी के साथ हैं और हमेशा टीएमसी में ही रहेंगे। कीर्ति आजाद ने भी संकट की इस घड़ी में ममता बनर्जी का हाथ थामे रखने का एलान किया। लेकिन जो बात इन बयानों के पीछे छिपी है, वह यह है कि इन नेताओं के पास फिलहाल कोई और चारा है भी नहीं। सबसे पहले बात शत्रुघ्न सिन्हा की। शत्रुघ्न सिन्हा ने भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के खिलाफ जाकर भाजपा छोड़ी थी, लेकिन भाजपा में आज भी उनके कई पुराने मित्र मौजूद हैं। यही कारण है कि जब टीएमसी में तूफान आया तो उनकी चुप्पी ने सबको चौंकाया। वे न बागी खेमे में नजर आए, न ममता के साथ खुलकर। लेकिन जब यह साफ हो गया कि भाजपा उनके लिए अपने दरवाजे खोलने के मूड में नहीं है, तो उनकी कथित वफादारी की घोषणा सामने आ गई।
बता दें, शत्रुघ्न सिन्हा लंबे समय तक भाजपा के चमकते सितारे रहे। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वे केंद्रीय मंत्री रहे। लेकिन धीरे-धीरे पार्टी में उनकी पूछ कम होती गई। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जब भाजपा ने नई करवट ली तो पुरानी पीढ़ी के कई नेताओं को हाशिये पर धकेल दिया गया। शत्रुघ्न सिन्हा पार्टी में घुट-घुटकर रहते रहे और अंदर ही अंदर असंतोष पकता रहा। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा से नाता तोड़ लिया और कांग्रेस के टिकट पर पटना साहिब से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए। इसके बाद उनका राजनीतिक सफर भटकाव का शिकार रहा और अंततः वे तृणमूल कांग्रेस में आ गए। 2024 के लोकसभा चुनाव में शत्रुघ्न सिन्हा आसनसोल से करीब साठ हजार वोटों से जीते। लेकिन यह जीत उनकी अपनी नहीं, ममता बनर्जी की लहर थी। अब जब वही लहर उतर रही है, तो उनके पास लौटने के लिए कोई ठिकाना नहीं है। कीर्ति आजाद की कहानी तो और भी दिलचस्प है। दिसंबर 2015 में दिल्ली और जिला क्रिकेट संघ में कथित अनियमितताओं तथा भ्रष्टाचार को लेकर तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को खुले तौर पर निशाना बनाने के लिए उन्हें भाजपा से निलंबित कर दिया गया था। वे 2018 में कांग्रेस में शामिल हो गए थे। कांग्रेस ने उन्हें 2019 में धनबाद से टिकट दिया, लेकिन वहां भी उन्हें मुंह की खानी पड़ी। इसके बाद 2024 में वे तृणमूल कांग्रेस के जरिये बर्धमान-दुर्गापुर से लोकसभा पहुंचे। कीर्ति आजाद इस सीट से करीब 14 हजार वोटों से जीते। इस तरह एक ऐसे नेता जो कभी भाजपा के दिग्गज क्रिकेटर-सांसद हुआ करते थे, उनकी राजनीतिक यात्रा भाजपा से कांग्रेस और कांग्रेस से टीएमसी तक आ पहुंची। अब भाजपा उनसे दूरी बनाए हुए है और कांग्रेस भी उन्हें वापस लेने की स्थिति में नहीं है, इसलिए मजबूरी यही है कि ममता की डूबती नैया को थामे रखो और उसे वफादारी का नाम दो।
बाबुल सुप्रियो की कहानी इन दोनों से थोड़ी अलग लेकिन उसी धागे में पिरोई हुई है। वे आसनसोल से दो बार सांसद रहे और नरेंद्र मोदी सरकार में केंद्रीय राज्यमंत्री भी रहे। लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद जब भाजपा को बंगाल में करारी हार मिली और पार्टी के भीतर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ, तो बाबुल सुप्रियो ने भी भाजपा से मुंह मोड़ लिया। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद टीएमसी में शामिल होने वाले नेताओं में शामिल थे। तृणमूल ने उन्हें बालीगंज विधानसभा उपचुनाव में उतारा और वे जीत भी गए। लेकिन विधायक बनने के बाद भी उनकी राजनीतिक हैसियत वही नहीं रही जो कभी केंद्रीय मंत्री के रूप में थी। अब जब टीएमसी खुद संकट में है, तो भाजपा की ओर उनकी नजर स्वाभाविक रूप से जाती है, लेकिन भाजपा उन्हें पार्टी में वापस लेने की कोई इच्छा नहीं रखती। उधर, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद से तृणमूल कांग्रेस के भीतर अब तक का सबसे बड़ा और भयंकर ‘युद्ध’ छिड़ा हुआ है। टीएमसी के बीस सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मिलकर उन्हें एक पत्र सौंपा है जिसमें अलग गुट बनाने की सूचना देते हुए लोकसभा में अलग बैठने की जगह देने की मांग की गई है। दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए लोकसभा में कम से कम उन्नीस सांसदों का समर्थन आवश्यक है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि टीएमसी सांसदों का समर्थन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को मिलता है, तो सरकार के लिए परिसीमन और एक देश-एक चुनाव जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों को आगे बढ़ाना आसान हो सकता है। बागी गुट अपने कुनबे को बढ़ाने के लिए लगातार सांसदों का समर्थन जुटा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम में यह तीन नेता एक अजीब कशमकश में फंसे हुए हैं। एक तरफ बागी खेमा है जो भाजपा का दामन थामने की तैयारी कर रहा है, दूसरी तरफ ममता बनर्जी का खेमा है। शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आजाद और बाबुल सुप्रियो न उस पार जा सकते हैं, न इस पार रह सकते हैं। बागी खेमे के साथ जाने का मतलब होगा भाजपा के दरवाजे पर दस्तक देना, लेकिन भाजपा उनके लिए वह दरवाजा खोलने को तैयार नहीं है। ऐसे में ममता के साथ बने रहना इनकी मजबूरी है, लेकिन यह तीनों इसे वफादारी का नाम देकर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। बहरहाल, उक्त तीन के अलावा तृणमूल कांग्रेस में और भी कई ऐसे नेता हैं जिनके लिए भाजपा के दरवाजे बंद हैं। महुआ मोइत्रा, सौगात रॉय, और सायोनी घोष जैसे नाम टीएमसी के उन चेहरों में शामिल हैं जो भाजपा के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकते। महुआ मोइत्रा का राजनीतिक और वैचारिक रुख भाजपा के एकदम विपरीत रहा है और वे लगातार केंद्र सरकार पर हमलावर रहती हैं। सौगात रॉय वामपंथी झुकाव वाले वरिष्ठ नेता हैं जिनका भाजपा से कोई तालमेल कभी नहीं बैठा। इनके अलावा वे टीएमसी विधायक और नेता जो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए हैं, उनके लिए भी भाजपा की जगह तंग है। गौरतलब हो, राजनीति का यह खेल बड़ा निर्मम होता है। जब तक हवा अनुकूल रहती है, तब तक दावेदारी होती है। जब हवा पलट जाती है, तब मजबूरियां सामने आती हैं और उन्हें सिद्धांत का जामा पहना दिया जाता है। शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आजाद और बाबुल सुप्रियो तीनों ने अपनी-अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते भाजपा को छोड़ा। तीनों ने यह भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन वापसी का रास्ता बंद हो जाएगा। आज वे ममता बनर्जी की वफादारी की बात करते हैं, लेकिन असल में यह वफादारी नहीं, एक सियासी मजबूरी है जिसने वफादारी का चोला ओढ़ लिया है। जो नेता घुट-घुटकर पार्टी में बने रहते हैं और मन मसोसकर बयानबाजी करते हैं, वे वफादार नहीं, मजबूर होते हैं। फर्क बस इतना है कि यह मजबूरी कभी-कभी इतनी सफाई से वफादारी का रूप ले लेती है कि खुद नेता को भी भ्रम हो जाता है।

