
लेखिका सुनीता लाड–भामरे के लिए पुणे पुस्तक महोत्सव 2025 बना ‘घरवापसी’ का यादगार क्षण
पुणे : लेखक के जीवन में कुछ पल ऐसे होते हैं, जब स्थान, स्मृतियां और उद्देश्य एक साथ आकर भावनाओं को गहराई से छू लेते हैं। सिंगापुर निवासी लेखिका सुनीता लाड–भामरे के लिए ऐसा ही भावुक क्षण पुणे पुस्तक महोत्सव 2025 में देखने को मिला। यह महोत्सव उनकी पूर्व शिक्षण संस्था फर्ग्युसन कॉलेज के ऐतिहासिक परिसर में आयोजित किया गया, जिसने इस अवसर को और भी विशेष बना दिया।
कॉलेज परिसर में कदम रखते ही सुनीता लाड–भामरे मानो अपनी छात्र जीवन की यादों में लौट गईं। छायादार रास्ते, पुरानी कक्षाएं और खुले मैदान उनके अतीत की जीवंत स्मृतियों से भर उठे। एक छात्रा के रूप में जिस संस्थान ने उन्हें सोचने और अभिव्यक्ति की दिशा दी, उसी परिसर में एक स्थापित लेखिका और आमंत्रित अतिथि के रूप में लौटना उनके लिए गर्व और आत्मिक संतोष का क्षण रहा।
इस अवसर पर सुनीता लाड–भामरे ने कहा, “फर्ग्युसन कॉलेज ने मुझे विचार और अभिव्यक्ति की मजबूत नींव दी। अपनी किताबों और कहानियों के साथ यहां लौटना मेरे लिए बेहद निजी और भावनात्मक अनुभव है।”

महोत्सव के दौरान उन्होंने युवा पाठकों, शिक्षकों और पुस्तक प्रेमियों से खुलकर संवाद किया। इस दौरान उनकी पुरस्कार विजेता बाल कादंबरी ‘काली एंड द मिस्टीरियस ट्विन्स: कीपर्स ऑफ द बिग सीक्रेट’ पर विशेष चर्चा हुई। एम्बेसी बुक्स द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक को ‘साहित्य स्पर्श पुरस्कार’ और ‘पेन एंड पेपर पुरस्कार’ से सम्मानित किया जा चुका है। कल्पनाशील कथानक, सशक्त बाल नायिका और पर्यावरण संरक्षण व साहस जैसे विषयों ने पाठकों का विशेष ध्यान आकर्षित किया।
महोत्सव में बच्चों के साथ हुआ उनका संवाद सबसे यादगार रहा। पुस्तक पर हस्ताक्षर करते हुए और चर्चा के दौरान उन्होंने बच्चों को अपनी कल्पनाशक्ति पर विश्वास करने, सवाल पूछने और स्वयं को पर्यावरण का संरक्षक मानने के लिए प्रेरित किया। इस आत्मीय संवाद ने यह संदेश मजबूत किया कि बाल साहित्य कम उम्र में ही सार्थक विचारों के बीज बोने का सशक्त माध्यम है।
उल्लेखनीय है कि पुणे पुस्तक महोत्सव 2025 अपने सुव्यवस्थित आयोजन, विचारशील विषय चयन और देशभर से आए प्रतिष्ठित लेखकों, विचारकों व साहित्यकारों की उपस्थिति के कारण विशेष पहचान बना रहा।

सुनीता लाड–भामरे के लिए यह महोत्सव केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक ‘घरवापसी’, कहानी कहने की शक्ति का उत्सव और पुस्तकों के उस चिरस्थायी महत्व की याद था, जो पीढ़ियों को एक-दूसरे से जोड़ता है।


