दिल्ली

मानव–वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं

मानव–वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं

सांसद प्रो. डॉ. मेधा कुलकर्णी की मांग; किसानों की सुरक्षा पर जोर, हर साल 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान

 

नई दिल्ली/पुणे: महाराष्ट्र में मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष अब बेहद गंभीर रूप ले चुका है। वन्यजीवों के कारण खेती को होने वाला नुकसान सालाना 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया है। साथ ही, वन्यजीव हमलों में जनहानि के मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए सरकार को तत्काल और ठोस उपाय करने चाहिए, ऐसी मांग राज्यसभा सांसद प्रो. डॉ. मेधा कुलकर्णी ने आज राज्यसभा में उठाई। उन्होंने इस मुद्दे को आक्रामक तरीके से रखते हुए ग्रामीण महाराष्ट्र की भयावह वास्तविकता की ओर केंद्र सरकार का ध्यान आकर्षित किया।

 

प्रो. डॉ. कुलकर्णी ने सदन को बताया कि वर्ष 2023-24 के दौरान वन्यजीवों द्वारा किए गए नुकसान को लेकर करीब 40 हजार शिकायतें दर्ज की गई हैं। जंगली सांड, नीलगाय, जंगली सूअर और बंदरों के कारण फसलों को भारी नुकसान हो रहा है। सरकार द्वारा दी जाने वाली मुआवजा राशि किसानों की मेहनत और नुकसान की तुलना में बेहद अपर्याप्त है। यह समस्या केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि मानवीय जीवन से भी जुड़ी हुई है। पिछले एक वर्ष में वन्यजीव हमलों में 50 से अधिक लोगों की मौत हुई है, जबकि 300 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं।

 

उन्होंने बताया कि नाशिक, पुणे, पालघर, ठाणे, सांगली, कोल्हापुर, गडचिरोली और चंद्रपुर जैसे जिलों में तेंदुओं का आतंक इतना बढ़ गया है कि लोगों के लिए घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया है। कई स्थानों पर लोगों को अपनी जान बचाने के लिए गले में कांटों वाले कॉलर (स्पाइक कॉलर) पहनने पड़ रहे हैं। कुछ इलाकों में हालात इतने गंभीर हैं कि स्कूल तक बंद रखने पड़े हैं। तेंदुओं द्वारा मां की गोद से बच्चे को उठाकर ले जाने जैसी घटनाएं सामने आई हैं, जो स्थिति की भयावहता को दर्शाती हैं।

मानव–वन्यजीव संघर्ष के कारणों का विश्लेषण करते हुए प्रो. डॉ. कुलकर्णी ने तेजी से बढ़ते शहरीकरण, जंगलों के क्षरण और बिगड़ती खाद्य श्रृंखला को प्रमुख कारण बताया। पुणे में रास्ता भटकने के बाद एक जंगली सांड की मौत की घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने वन्यजीवों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल इंसानों के लिए नहीं, बल्कि वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए भी खतरनाक बनता जा रहा है।

प्रो. डॉ. कुलकर्णी ने चेतावनी देते हुए कहा, “शहरीकरण राक्षसी गति से बढ़ रहा है, जिससे वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं। यदि समय रहते जंगलों का पुनरुद्धार नहीं किया गया, तो मानव और वन्यजीव—दोनों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। इस संघर्ष को रोकने के लिए हमें तुरंत और निर्णायक कदम उठाने होंगे।”

मानव–वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए सुझाए गए उपाय

– प्रकृति और वन्यजीव संरक्षण के लिए खाद्य श्रृंखला को सुरक्षित किया जाए

– रेलवे लाइनों और राष्ट्रीय महामार्गों पर वन्यजीवों के लिए अंडरपास और ओवरपास बनाए जाएं

– जंगलों की सीमाओं पर सोलर फेंसिंग और आधुनिक अलार्म सिस्टम लगाए जाएं

– नुकसान की भरपाई के लिए डिजिटल प्रणाली के जरिए त्वरित मुआवजा दिया जाए

– वन विभाग की ‘क्विक रिस्पॉन्स टीम’ को 24 घंटे सक्रिय रखा जाए

– मानव और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा के लिए जंगलों के क्षरण और अनियंत्रित शहरी

करण पर रोक लगाई जाए

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