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ट्रंप की धमकियों के बीच मोदी की चुप्पी, इतिहास में गूंजती इंदिरा की रणनीति

ट्रंप की धमकियों के बीच मोदी की चुप्पी, इतिहास में गूंजती इंदिरा की रणनीति

विशेष राजनीतिक विश्लेषण | विशाल समाचार

भारत और अमेरिका के बीच कूटनीतिक रिश्ते एक बार फिर चर्चा में हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर टैरिफ बढ़ाने और रूस से तेल खरीद को लेकर दिए गए बयानों ने दोनों देशों के संबंधों में नया तनाव पैदा किया है। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि भारत उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप कदम नहीं उठाता, तो अमेरिका शुल्क और बढ़ा सकता है।

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन बयानों पर सार्वजनिक रूप से कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी। उन्होंने संयम और रणनीतिक चुप्पी के साथ कूटनीतिक संतुलन बनाए रखा। राजनीतिक विरोधी इसे कमजोरी बता रहे हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि कभी-कभी मौन ही सबसे मजबूत जवाब होता है।

इतिहास के पन्ने पलटें तो ऐसी रणनीति नई नहीं है। वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके सलाहकार हेनरी किसिंजर के दबाव का सामना शब्दों से नहीं, बल्कि रणनीतिक फैसलों से किया था। उस समय पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों के कारण लाखों शरणार्थी भारत आए थे। अमेरिका पाकिस्तान के पक्ष में झुका हुआ था और भारत पर युद्ध रोकने का दबाव बना रहा था।

निक्सन ने इंदिरा गांधी को ओवल ऑफिस में लंबे समय तक इंतजार कराया और अमेरिकी दस्तावेजों के अनुसार, भारत के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया गया। इसके बावजूद इंदिरा गांधी ने सार्वजनिक प्रतिक्रिया से परहेज किया। उन्होंने अगस्त 1971 में सोवियत संघ के साथ मैत्री संधि कर भारत की सुरक्षा को मजबूत किया। नतीजा यह रहा कि मात्र 13 दिनों में पाकिस्तान को करारी हार मिली और 16 दिसंबर 1971 को बांग्लादेश का जन्म हुआ।

आज ट्रंप की राजनीतिक शैली निक्सन से काफी मिलती-जुलती दिखाई देती है। वे सहयोगियों पर दबाव बनाते हैं, बयानों में पलटी मारते हैं और धमकियों की राजनीति करते हैं। 5 जनवरी 2026 को ट्रंप ने भारत को चेतावनी दी कि यदि रूस से तेल खरीद बंद नहीं हुई तो टैरिफ बढ़ाए जा सकते हैं। भारत सरकार ने इन दावों का खंडन करते हुए स्पष्ट किया कि ऐसी कोई बातचीत नहीं हुई है।

आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 में भारत ने रूस से लगभग 35 प्रतिशत कच्चा तेल आयात किया, जो पहले 2 प्रतिशत था। बाद में रणनीतिक संतुलन बनाते हुए इसे घटाकर 25 प्रतिशत किया गया। भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा से समझौता किए बिना दबाव को संतुलित किया।

ट्रंप भारत को “टैरिफ किंग” कहते हैं, लेकिन मोदी सरकार ने इन आरोपों पर सार्वजनिक बहस से दूरी बनाए रखी। रूस से एस-400 मिसाइल सौदे से लेकर कश्मीर पर मध्यस्थता के दावे तक, भारत ने स्पष्ट नीति अपनाई—कोई बाहरी हस्तक्षेप नहीं।

इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी की रणनीति में एक समान सूत्र दिखाई देता है—राष्ट्रीय हित सर्वोपरि। इंदिरा ने गुटनिरपेक्षता को मजबूती दी, मोदी इसे रणनीतिक स्वायत्तता कहते हैं। दोनों जानते थे कि अमेरिकी राष्ट्रपति अस्थायी होते हैं, लेकिन राष्ट्र स्थायी।

आज भारत की अर्थव्यवस्था 3.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की है, जबकि 1971 में यह केवल 67 अरब डॉलर थी। भारत अब वैश्विक मंच पर पहले से कहीं अधिक मजबूत स्थिति में है। ट्रंप की धमकियां अल्पकालिक हो सकती हैं, लेकिन भारत की कूटनीति दीर्घकालिक सोच पर आधारित है।

इतिहास बताता है कि शोर मचाने से नहीं, बल्कि धैर्य और रणनीति से बड़े फैसले लिए जाते हैं। इंदिरा गांधी ने निक्सन की धमकियों का जवाब बांग्लादेश बनाकर दिया था। आज मोदी ट्रंप की धमकियों का जवाब मजबूत अर्थव्यवस्था, संतुलित विदेश नीति और आत्मनिर्भर भारत के जरिए दे रहे हैं।

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